लखनऊ. फतेहपुर के धाता थानाक्षेत्र के कबरहा गांव में दुदआ का मंदिर बनाया जा रहा है। ऐसे में dainikbhaskar.com आज आपको बताने जा रहा है कि कैसे 22 STF के जवानों ने बिना खाए-पीए 22 जुलाई 2008 ददुओं का मार गिराया। STF टीम के लीडर रहे एनएसजी कमांडो अनिल कुमार सिंह की जुबानी...
- पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने तेज तर्रार आईपीएस अमिताभ यश को ददुआ को मारने का जिम्मा सौंपा।
- 15 अप्रैल 2008- सीएम मायावती के आदेश पर STF की टीम ने चंबल की ओर कूच किया।
- 21 जुलाई- मुखबिर से छोटा पटेल की लोकेशन मिली।
- 24 घंटे बिना खाए-पीए और सोए हमने छोटा पटेल को उसके 4 साथियों के साथ मार गिराया।
- 22 जुलाई- सुबह 3 बजे मुखबिर और सर्विलांस से इनपुट मिला कि ददुआ झलमल के जंगलों में है। पूरी टीम बिना सोचे आगे बढ़ गई।
- सुबह 3 बजे से 7 बजे तक टीम ने छुपते-छुपाते जंगल का करीब 10 किलोमीटर सफर तय कर लिया था।
- इसके बाद टीम ने 1 घंटे तक अपनी पोजीशन ली और ददुआ के गैंग पर हमला बोला दिया।
- सुबह 9:15 बजे 1 घंटे से ज्यादा चली गोलीबारी के बाद ददुआ को उसके 5 साथियों के साथ ढेर कर दिया गया।
- इसके बाद अफसरों को वायरलेस से इसकी सूचना दी गई।
- सुबह 11 बजे डीजीपी विक्रम सिंह खुद हेलीकाप्टर से घटनास्थल पर पहुंचे।
कुछ इस तरह रचा था जाल
अनिल सिंह ने बताया, जंगलों में मुखबिर पर भरोसा भी आसानी से नहीं किया जा सकता था। सबसे पहले हमने अपनी ताकत और कमजोरियों को ददुआ की ताकत के साथ आंका। ददुआ के खात्मे का मास्टर प्लान एसएसपी अमिताभ यश और एएसपी अनंत देव ने बनाया था।
- STF के लिए सबसे बड़ी समस्या थी कि किस मुखबिर पर भरोसा किया जाए।
- साथ ही सबसे बड़ी चुनौती थी कि ददुआ को इस बात का विश्वास दिलाना कि वह STF के निशाने पर नहीं है।
- प्लान के मुताबिक, STF के जवानों ने ददुआ के मुखबिरों के सामने कहा, हम तो सिर्फ समय काटने आए हैं।
- इसकी खबर लगते ही ददुआ निश्चिन्त हो गया।
- इसी बीच STF ने ददुआ के उन सपोर्टस को भी खोज निकाला, जो सिर्फ ददुआ के डर से उसका साथ देते थे।
- उन लोगों को टीम ने भरोसे में लेकर ऑपरेशन ददुआ शुरू किया।
- ऑपरेशन पूरा होने के बाद कई लोगों को गलेंट्री अवार्ड मिला।
- हालांकि, कई टीम मेंबर हकदार होते हुए भी प्रमोशन नहीं पा सके। इसी कारण अनिल कुमार सिंह ने त्याग पत्र दे दिया था।
खौफ में बिताए 30 घंटे
अनिल सिंह ने बताया, जंगलों का दस्तूर है, वह कभी कोई गलती माफ नहीं करता। यही हमारे साथ था। 22 जुलाई को हम 50 किलोमीटर का सफर तय कर चुके थे। 24 घंटे से भी
ज्यादा का समय बीत चुका था, लेकिन हमने एक मिनट भी नींद नही ली थी। SSP और SP समेत 22 लोग जंगलों को चीरते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। झलमल के जंगलों में हमे
चारों तरफ से सिर्फ मौत की आहट सुनाई देती थी। मिशन के बारे में आखिर में बस इतना बोलना चाहता हूं कि हमने पूरी हिम्मत से काम लिया और किस्मत ने हमारा साथ दिया।