लखनऊ. सूबे की पुलिस को अब कोर्ट में आरोप-पत्र दाखिल करते समय अपराधी का स्थाई पता (परमानेंट एड्रेस) भी लिखना होगा। ताकि वह जमानत पर छूटने के बाद अपना पता ठिकाना बदल कर पुलिस और कोर्ट को चकमा न दे सके। हाईकोर्ट के दखल के बाद पुलिस महानिदेशक ने 17 सितंबर, 2014 को इस बाबत विभागीय आदेश जारी कर दिया।
20 साल पुरानी एक क्रिमिनल अपील की सुनवाई के दौरान जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान की बेंच ने पाया कि अक्सर देखने में आता है कि आरोपी पुलिस को अपना अस्थाई पता दर्ज करा देता है। वहीं, जमानत पर छूटने के बाद वह अपना ठिकाना बदल देता है। इसके बाद जब वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में हाजिर नहीं होता है तो कोर्ट उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करती है।
गैर जमानती वारंट का अनुपालन नहीं कर पाती पुलिस
हालांकि, पुलिस गैरजमानती वारंट का अनुपालन नहीं कर पाती और यह कह कर अपने हाथ खड़े कर देती है कि अपराधी नहीं मिल रहा है। इसलिए क्योंकि उसने अपना ठिकाना बदल लिया है। कोर्ट ने पाया कि ऐसे में वर्षों से लंबित अपीलों पर सुनवाई अटकी पड़ी रहती है। जोकि न्याय प्रशासन में बाधा खड़ी करने जैसा है।
कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर हुए गृह सचिव
समस्या का हल तलाशने के लिए जस्टिस सिंह ने आदेश जारी कर गृह सचिव को तलब किया। गृह सचिव गुरुवार को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर हुए। उनकी ओर से पक्ष रखते हुए शासकीय अधिवक्ता रिशाद मुर्तजा ने कोर्ट को अवगत कराया कि इस समस्या से निपटने के लिए पुलिस महानिदेशक ने विभागीय आदेश जारी कर विवेचक को भविष्य में आरोपितों के अस्थाई पते के साथ ही स्थाई पता लिखना भी सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।
लखनऊ हाईकोर्ट की फाइल फोटो।