तस्वीर में: खनिज भवन का बोर्ड जिसपर लिखा है खनिकर्म जो आम बोलचाल की भाषा नहीं है।
लखनऊ. 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि कितने लोगों को सरकारी हिंदी समझ में आती है? लोग आम बोलचाल की हिंदी भाषा को तवज्जो (ध्यान) देना पसंद करते हैं या फिर जटिल (क्लिस्ट) शब्द को? सूबे की राजधानी लखनऊ में ही इसके कई उदहारण देखने को मिलते हैं। जब आम आदमी के सिर से सरकारी हिंदी गुजर जाती है। चाहे सरकारी हिंदी बोर्ड हो या फिर सरकारी हिंदी में कोई दस्तावेज। आम आदमी को इसे समझने के लिए काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। ऐसे में लोगों का मानना है कि हिंदी बोलचाल की भाषा में ही होनी चाहिए।
यूपी की बात करें तो यहां सरकारी वेबसाइट में भी हिंदी भाषा से खेल होते दिख रहे हैं। यहां की ग्रामीण विकास विभाग की वेबसाइट को ही देखिए। इस पर ग्रामीणों से जुड़ी योजनाओं की भरमार है, लेकिन इंग्लिश में है। ऐसे में कहा जा सकता है कि यूपी में किस तरह से हिंदी का मखौल उड़ाया जा रहा है।
क्या कहते हैं वरिष्ठ साहित्यकार काशी सिंह
वरिष्ठ साहित्यकार काशी सिंह का कहना है कि असली हिंदी वही है जो गलियों, चौराहों और बाजारों में बोली जाती है। जिसे आम आदमी आसानी से समझ पाता है, बोल सकता है और लिख सकता है। कुछ लोग हिंदी में संस्कृत शब्दों का प्रयोग कर इसे क्लिस्ट बना देते हैं। सरकारी भाषा भी आम बोलचाल की भाषा में होना चाहिए।
जरूरत के हिसाब से हो हिंदी भाषा का प्रयोग
ऑप्टिकल कंपनी में काम करने वाले प्रशांत श्रीवास्तव कहते हैं कि शुरू से हम लोगों ने बोलचाल वाली हिंदी का प्रयोग किया है। ऐसे में जब कभी सरकारी दस्तावेजों से पाला पड़ता है तो काफी दिक्कत होती है। उन्होंने कहा कि अच्छा यह होता कि जरूरत के हिसाब से हिंदी भाषा का सरकारी प्रयोग किया जाता।
आगे पढ़िए सरकारी दस्तावेजों को समझने के लिए आम आदमी कोशिश तो करता है, लेकिन ज्यादातर शब्द उन्हें समझ में नहीं आते…