फोटो: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का लोगो।
ह्यूमन राइट्स डे: हर साल 10 दिसंबर को 'ह्यूमन राइट्स डे' मनाया जाता है। यूपी में कई ऐसी जगह हैं, जहां आज भी लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं। निजी स्वार्थ के चलते उनपर अत्याचार किया जा रहा है। इस कड़ी में dainikbhaskar.com ने यूपी के कुछ ऐसे ही मामलों को पर नजर डाली। इसमें यह पाया कि आयोग की सख्ती और उसकी कार्रवाई से ही मानवाधिकार यूपी में सुरक्षित है।
लखनऊ. यूपी में लगातार मानवाधिकारों के हनन के मामले सामने आते रहे हैं। राज्य की सरकार और समूचा सिस्टम इस हनन को न सिर्फ छुपाने बल्कि उल्लंघन करने वालों को बचाने में जुटा रहता है। ऐसे में लोगों की आस सिर्फ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग पर टिकी हुई है। शायद यही कारण है कि आयोग मामलों में शिकायत और कार्रवाई के लिए पहले से काफी ज्यादा एक्टिव और स्वतः संज्ञान लेने लगा है।
खात बात ये है कि यूपी सरकार के अधिकारियों को मानवाधिकार हनन के मामले नजर नहीं आते। वहीं, जब आयोग की जांच या नोटिस मिलती है तो घटना भी दिखने लगती और कार्रवाई भी शुरू हो जाती है। dainikbhaskar.com की टीम ने यूपी के कुछ ऐसे ही मामलों को पर नजर डाली। इसमें यह पाया कि आयोग की सख्ती और उसकी कार्रवाई से ही मानवाधिकार यूपी में सुरक्षित है।
जानिए ऐसे कुछ मामले
इसी साल सितंबर महीने में राज्य के झांसी के खेड़ा गांव में दलित युवक सुजान सिंह को जमीनी विवाद में इलाके के ही दबंग द्वारा मल मूत्र खिलाने और उसके प्राइवेट पार्ट जलाने का मामला सामने आया। दबंगों ने युवक को बुरी तरह पीटा और सर भी गंजा कर दिया था। इसके बाद हालात बिगड़ने पर उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इस दौरान उसके पिता ने पुलिस में शिकायत की, लेकिन कार्रवाई के बजाए पुलिस ने उन्हें ही चुप रहने की नसीहत दे डाली। 18 सितंबर को मामला मीडिया की सुर्ख़ियों में आया तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 26 सितंबर को डीएम और एसएसपी झांसी को नोटिस जारी कर मामले की पूरी रिपोर्ट दो हफ्ते में देने को कहा। ख़ास बात यह रही की एनएचआरसी की कार्रवाई के डर के चलते ही घटना के कई दिन बाद मामले में रिपोर्ट दर्ज की गई।
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