लखनऊ. बुधवार को 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005' विषय पर लखनऊ परिक्षेत्र के थानाध्यक्षों और 1090 के पुलिस अधिकारियों से वार्ता की गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य था कि जिले के पुलिस अधिकारी और 1090 के अधिकारी भी घरेलू कानून को समझें और प्रताडि़त महिलाओं को राहत दिलाने की पूरी कोशिश करें।
हमसफर महिला सहायता केंद्र की मैनेजिंग ट्रस्टी निशी मेहरोत्रा ने कहा कि देश में आज भी घरेलू हिंसा को हिंसा का दर्जा नहीं मिला है। यह बेहद दुखद है क्योंकि दर्जा नहीं मिलने से पुलिस इन मामलों पर कोई खास कार्रवाई नहीं करती है। इससे महिलाओं को आए दिन घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। वहीं, महिला प्रकोष्ठ के आईजी नवनीत सिकेरा ने कहा कि इस घरेलू हिंसा के मामलों में एनजीओ को भी मदद करनी चाहिए। ऐसे में वे काम करेंगे तो मीडिया उन्हें लोगों को दिखाएगा और इसका सीधा असर सरकार पर होगा।
इस कार्यक्रम में इस बात पर भी चर्चा की गई कि थानों में शौचालय नहीं है। इसके साथ ही पुलिस को छुट्टी नहीं मिलने के विषय पर बातचीत की गई। इसी क्रम में नवनीत सिकेरा ने कहा कि पुलिस के अमानवीय चेहरे का सबसे बड़ा कारण अपने परिवार से दूर रहना है कोई सुविधा नहीं मिलना होता है।
पुलिस के सामने हैं तीन दिक्कतें
आइजी नवनीत सिकेरा बताते हैं कि पुलिसवालों के सामने कई परेशानियां आती हैं। अधिकारी या जज आदेश पारित कर देता है। हालांकि, उसे लागू करने में प्रेक्टिकल प्राब्लम आती है और उसे कोई नहीं समझता है। दूसरा, महिला थाने में आती है तो रिपोर्ट लिखवाने की जगह केवल हड़काने के लिए कहती है। अब तो हम किसी को थाने पर बुलाकर हड़का भी नहीं सकते वरना मानवाधिकार से फाइन लग जाता है। तीसरा यह कि रेप केस के दौरान जांच के लिए डॉक्टर आनाकानी या देर करते हैं। ऐसे समय में हम ज्यादा कुछ नहीं कर पाते हैं।
आगे पढ़िए प्रॉबलम्स को ड्रॉफ्ट करके दें...