बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती इंसेफ्लाइटिस से पीड़ित बच्चा की फाइल फोटो
लखनऊ. प्रदेश के सात जिलों में कहर बरपा रहे एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईस) की गति पर नियंत्रण पाने के लिए किए जा रहे तमाम सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। जनवरी 2014 से लेकर अब तक 350 मरीजों की मौत केवल बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में हो चुकी है। इन मौतों का रहस्य सुलझाने के लिए सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) अटलांटा की टीम इलाके में दौरे पर है। स्वास्थ्य विभाग यह जानने की कोशिश में जुटा हुआ है कि एन्ट्रोवायरस के चलते हो रही मौतों के पीछे और कितने वायरस जिम्मेदार हैं, जो टीकाकरण के बावजूद मरीजों पर भारी पड़ रहे हैं।
इन मौतों के पीछे कारणों का रहस्य जानने के लिए कई संस्थाओं द्वारा वर्ष 2005 से प्रभावित इलाकों का अध्ययन किया जा रहा है। हालांकि, अभी तक जिन संस्थाओं ने अध्ययन किया है उसमें किसी ने भी राज्य सरकार से अपना अनुभव सांझा नहीं किया है। ऐसे में प्रदेश सरकार के आमंत्रण पर इलाके के भ्रमण पर गई सीडीसी की टीम के सामने यह शर्त रखी गई है कि जो भी इनपुट मिलेंगे, उससे टीम राज्य सरकार से साझा करेगी।
एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम से लगातार मर रहे मरीज
मरने वालों में सबसे कम संख्या जापानी इंसेफ्लाइटिस की है। जबकि एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम के एन्ट्रोवायरस से लगातार मरीज मर रहे हैं। इन मौतों को रोकने के लिए ब्लॉक स्तर पर ट्रीटमेंट सेंटर भी खोले गए हैं। इंसेफ्लाइटिस से सबसे ज्यादा प्रभावित गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज शामिल हैं। जबकि सीमापवर्ती जिलों में आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर भी शामिल हैं। इन सबमें सबसे ज्यादा प्रभावित गोरखपुर और बस्ती मंडल है। यहां पर इस बीमारी से लगभग 90 फीसदी लोग पीड़ित हैं।
जापानी इंसेफ्लाइटिस और एईस में क्या है अंतर
जापानी इंसेफ्लाइटिस मच्छरों के काटने से होता है। इस पर नियंत्रण के लिए टीके मौजूद हैं। इस पर स्वास्थ्य विभाग ने तकरीबन 90 फीसदी सफलता हासिल कर ली है। वहीं एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईस) एक जलजनित बीमारी है। इसके वायरस गंदगीयुक्त जल के संपर्क में आने के चलते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। अभी तक इस पर नियंत्रण के लिए कोई टीका नहीं बना है।
आगे पढ़िए तीन चरणों में रिसर्च करेगी सीडीसी की टीम…