फोटो: प्रतिनिधि मंडल के साथ चर्चा करते हुए केजीएमयू के कुलपति प्रो. रविकांत।
लखनऊ. एंटी बायोटिक दवाओं की उपयोगिता और इन दवाओं के चलते स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल असर को देखते हुए आने वाले दिनों में किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन अटलांटा-अमेरिका से मिलकर मंथन कर सकता है। जिससे इलाज के दौरान मरीज को रोग के लक्षणों के आधार पर दवाओं को सुनिश्चित किया जा सके। सोमवार को सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की टीम ने कुलपति प्रो. रविकांत ने इस मसले पर चर्चा की।
प्रदेश सरकार के निमंत्रण पर गोरखपुर में जापानी इंसेफलाइटिस पर रिसर्च करने के लिए अटलांटा से आयी सीडीसी टीम के दो सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को प्रो. रविकांत से मुलाकात की। बैठक के दौरान टीम के सदस्यों ने मरीजों के इलाज को लेकर उपलब्ध संसाधनों के बारे में जानकारी हासिल की। इसके बाद टीम के सदस्यों ने कुछ विभागों का निरीक्षण भी किया।
एंटी बायोटिक दवाओं की उपयोगिता को लेकर चर्चा
बैठक के दौरान टीम के सदस्यों के समक्ष प्रो. रविकांत ने एंटी बायोटिक दवाओं की उपयोगिता को लेकर चर्चा की। सदस्यों ने केजीएमयू को इस मसले पर सहयोग करने का आश्वासन दिया है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि, आगामी समय में इस मामले में एमओयू करने पर विचार कर सकता है।
एंटी बायोटिक दवाओं का असर हो रहा बेअसर
शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव हैं जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत और शरीर को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। ज्यादा मात्रा में खाई जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं इन्हें नष्ट करने का काम करती हैं। जैसे ही संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल शुरू हुआ उसी दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि पुराने सूक्ष्म जीवों ने अपना रूपांतरण कर लिया है। जीवाणु और विषाणु सूक्ष्म जीवों के ही प्रकार हैं, जो किसी भी कोशिका में पहुंचकर शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं। ये हमारी त्वचा, मुंह, नाक और कान के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं। फिर एक से दूसरे व्यक्ति में फैलने लगते हैं।
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