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जानि‍ए जंग-ए-आजादी में कानपुर की भूमि‍का, यहीं मि‍ले थे भगत सिंह और चंद्रशेखर

7 वर्ष पहले
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तस्‍वीर में: यही वह बि‍ल्‍डिंग है, जि‍समें गणेश शंकर वि‍द्यार्थी के समाचार पत्र 'प्रताप' का दफ्तर था।
लखनऊ. देश की आजादी के लिए क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते अपनी जान दे दी। काफी कुर्बानि‍यों के बाद देश भर में क्रांति की अलख जगी। इस अलख को जगाने में कानपुर की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यहीं पर काकोरी कांड की महत्त्वपूर्ण योजना बनी। वहीं, चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह की पहली मुलाकात भी इसी शहर में हुई।
हिंदुस्तान को आजाद कराने के लिए लड़ी गई जंग में कानपुर ने सक्रिय भूमिका निभाई। क्रांतिकारियों को अपने घरों में पनाह देनी हो या फिर जंगलों में उनके लिए भोजन या अन्य सामग्री पहुंचानी रही हो, यहां के लोगों की महत्‍वपूर्ण भूमि‍का रही। जंग-ए-आजादी के दौरान इस शहर के बाशिंदों ने वह सब कुछ किया जो एक सच्चे देशवासी को करना चाहिए।
सन 1857 से लेकर 1947 तक कानपुर क्रांतिकारियों का एक महत्वपूर्ण गढ़ बना रहा। यहां देश भर के क्रांतिकारियों ने शरण ली। यहां अंग्रेजों के खिलाफ योजनाएं बनाई गईं और क्रांति की मशाल को दिन पर दिन मजबूत किया गया। 15 अगस्त के मौके पर dainikbhaskar.com की टीम ने शहर की कुछ महत्‍वपूर्ण जगहों के बारे में जानकारी देने की कोशि‍श की है। वहीं, कानपुर में शहीद होने वाले कुछ शख्सियतों के बारे में बताई गई है।
यहीं था गणेश शंकर वि‍द्यार्थी के समाचार पत्र का दफ्तर
कानपुर के फीलखाना में गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र ‘प्रताप’ का दफ्तर हुआ करता था। गणेश शंकर अपनी पत्रकारिता के जरिये अंग्रेजी शासन को लगातार चुनौती दे रहे थे। क्रांतिकारियों के लिए प्रताप प्रेस एक महत्वपूर्ण ठिकाना हुआ करता था। यहां वे अपनी योजनाएं बनाते थे और छिप के रहते भी थे। खुद भगत सिंह ने बलवंत सिंह के नाम से प्रताप प्रेस में रहकर गणेश शंकर से पत्रकारिता सीखी थी।
गणेश शंकर से अक्‍सर मि‍लने आते थे चंद्रशेखर आजाद
चंद्रशेखर आजाद अक्‍सर गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने यहां आया करते थे। प्रेस से कुछ ही दूरी पर विद्यार्थी जी का एक कमरा भी था। आजाद वहीं पर रुक जाया करते थे। भगत सिंह को जब यह बात पता चली तो उन्होंने विद्यार्थी जी से कहा कि‍ उन्हें आजाद से मिलना है। एक रोज जब आजाद वहां आए तो गणेश शंकर ने भगत सिंह की इच्छा को उनके सामने रखा।
आगे पढ़ि‍ए कानपुर में पहली बार मिले थे भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद