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एलडीए की चौखट पर दम तोड़ती जिंदगी, अफसरों को नहीं है परवाह

7 वर्ष पहले
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एलडीए के अधिकारी और अपनी जमीन पर कब्जे के लिए दौड़ लगाता विकलांग शशांक (तस्वीर में)
  • अधिकारी नहीं ले रहे हैं सुध
  • एलडीए के संयुक्त सचिव की सफाई, जल्द होगा निपटारा
लखनऊ. एलडीए को भले ही लखनऊ डेवलेपमेंट अथॉरिटी है के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसका काम बिलकुल लेट डेवलेपमेंट अथॉरिटी की तरह है। शनिवार को दो अहम मामले अथॉरिटी के भवन में देखने को मिले जो, दौड़ तो हक के लिए रहे हैं, लेकिन कब्जा मिलना तो दूर, अफसर मामले को सुनने को भी तैयार नहीं हैं।
केस नंबर एक
विकलांगों के हक के लिए हर कोई दम भरता है। कई गैरसरकारी संस्थाएं भी इसके लिए फंड लेती हैं और काम करने का दावा भी करती हैं, लेकिन हकीकत बिलकुल अलग है। विकलांग शशांक चार साल से अपने भू खंड पर कब्जे के लिए चक्कर लगा रहा है। उसके पिता एलडीए अधिकारियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते बीमार हो गए। इसके बाद यह जिम्मेदारी उनका विकलांग बेटा उठा रहा है।

शशांक दोनों पैरों से विकलांग है। वह जमीन पर घिसटते हुए एलडीए आता है और हर दिन एक ही आश्वासन के साथ चला जाता है कि काम बाद में हो जाएगा। पैसों की भाषा समझने वाले अधिकारी शशांक की मजबूरी को नहीं समझ पा रहे हैं। उन्हें शशांक की लाचारी पर तरस भी नहीं आ रही है, यही वजह है कि वह यह जानते हुए भी कि उसके पास पैसे नहीं हैं, उसका काम नहीं कर रहे हैं।
शंशाक बताते हैं कि वह हाईस्कूल थे तब से दौड़ लगा रहे हैं। अब बीए कर रहे हैं। केस जहां था वहीं हैं। एलडीए के अधिकारी भले ही बदल गए हों, लेकिन उनका रवैया नहीं बदला। अधिकारी और बाबू सप्ताह और महीने में बुलाते और कुछ न कुछ बहाना बनाकर टहला देते हैं। कभी पैसे की मांग करते हैं, तो कभी कुछ बहाना बना देते हैं।
आगे पढ़िए, केस नंबर दो और एलडीए के संयुक्त सचिव की सफाई...