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तीन दोस्तों का कमाल, अंधेरे में डूबे 1500 गांवों को कर दिया रोशन

मेरा गांव पावर (एमजीपी) नाम की कंपनी बनाकर इन तीन दोस्त संदीप पांडेय, निखिल जयसिंघानी और यूएस नागरिक ब्रीयन शाद ने पांच जिलों के करीब दो हजार परिवार के एक लाख लोगों की शाम पहले से बेहतर कर दी है।

Dainik Bhaskar

Jul 06, 2015, 09:03 AM IST
'मेरा गांव पावर' के फाउंडर संदीप, निखिल और ब्रीयन। 'मेरा गांव पावर' के फाउंडर संदीप, निखिल और ब्रीयन।
लखनऊ. यूपी के हजारों गांवों के लाखों लोगों की जिंदगी सूरज की रोशनी में ही चहलकदमी करती है। लोग लालटेन और दीये की टिमटिमाती रोशनी के सहारे ही अपनी रात बिताते हैं, लेकिन तीन दोस्तों ने 1500 गांवों को रोशन करके लोगों का बरसों पुराना इंतजार खत्म कर दिया। ये तीन दोस्त संदीप पांडेय, निखिल जयसिंघानी और यूएस के रहने वाले ब्रीयन शाद हैं। इन्होंने 'मेरा गांव पावर' (एमजीपी) नाम की एक कंपनी बनाई। इसके जरिए उन्होंने पांच जिलों के करीब दो हजार परिवारों के एक लाख लोगों को बिजली देकर उनकी जिंदगी को नए मायने दिए।
साल 2010 में की शुरुआत
मूलरूप से मिर्जापुर के रहने वाले और लखनऊ में पले-बढ़े संदीप पांडेय ने साल 2010 में अपने दोस्त निखिल जयसिंघानी और ब्रीयन शाद के साथ मिलकर ऐसे गांवों को रोशन करने की ठानी, जहां सरकार अब तक बिजली नहीं दे पाई है। उन्होंने पहले सोलर पैनल वाला माइक्रोग्रिड लगाया। उसके बाद कच्चे मकानों में एलईडी बल्ब और चार्जिंग प्वाइंट लगाकर लोगों को केरोसिन से मुक्ति दिलाई। इन तीन दोस्तों ने साल 2011 में सीतापुर जिले के कहारनपुरवा गांव में पहला माइक्रोग्रिड लगाया था। ये लोग अब तक करीब पांच जिलों में 1800 से ज्यादा माइक्रोग्रिड लगा चुके हैं।
लोगों से नहीं लिया जाता पैसा
'मेरा गांव पावर' हर घर में दो एलईडी बल्ब और एक मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट उपलब्ध कराता है। लोगों से बल्ब या तार का पैसा नहीं लिया जाता है। उन्हें बस हर महीने 100 रुपए का भुगतान करना होता है। लोगों की सुविधा के लिए अब इसे 25 रुपए साप्ताहिक कर दिया गया है। शुल्क की वसूली गांव में ही बनाया गया एक विशेष समूह करता है।
केरोसिन से मुक्ति
'मेरा गांव पावर' के सीईओ संदीप पांडेय ने बताया कि आज भी यूपी में लाखों लोग लालटेन और लैंप पर निर्भर हैं। केरोसिन जलाने से इन्हें जितनी रोशनी नहीं मिलती, उससे कहीं ज्यादा शरीर को नुकसान पहुंचता है। कच्चे मकानों में आग भी ज्यादातर इन्हीं से लगती है। 'मेरा गांव पावर' का मकसद लोगों को केरोसिन के नुकसान से मुक्ति दिलाने के साथ ही साफ और सुरक्षित जिंदगी देना भी है।
आगे की स्लाइड्स में पढ़िए, नौकरी छोड़ निकल पड़े गांवों को रोशन करने...
एलईडी की रोशनी में पढ़ाई करते गांव के बच्चे। एलईडी की रोशनी में पढ़ाई करते गांव के बच्चे।
एमबीए करने के बाद एक माइक्रोफाइनेंस कंपनी में जॉब करने वाले संदीप बिजनेसमैन बनना चाहते थे। साथ ही कुछ ऐसा करने की ख्वाहिश थी, जिससे समाज के पिछड़े तबके को एक नई राह मिल सके। इसी तमन्ना में एक दिन संदीप ने नौकरी छोड़ दी और एक लाख रुपए की सेविंग लेकर नए मिशन पर निकल पड़े। इसी सफर के दौरान उन्हें गांवों में सोलर पावर से लोगों को रोशनी देने का ख्याल आया। उनके साथ एनआरआई दोस्त निखिल और अमेरिकी ब्रीयन शाद भी शामिल हो गए। तीनों दोस्त सीतापुर के कहारनपुरवा गांव में जाकर चार महीने तक रहे और लोगों में इसके प्रति विश्वास जगाया।
  
पैसा कमाना मकसद नहीं
'मेरा गांव पावर' के को-फाउंडर और सीईओ संदीप पांडेय ने dainikbhaskar.com को बताया, 'मेरा उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है। गांव के लोगों की जिंदगी में बेहतर बनाना है। एक माइक्रोग्रिड पर होने वाले खर्च की भरपाई ढाई साल में हो पाती है। शुरू में हमें टेरी और मिलाप सहित कई संगठनों से लोन लेना पड़ा। हालांकि, कंपनी अब नो प्रोफिट नो लॉस पर काम कर रही है।'
 
दिनभर में रोशन कर देते हैं गांव
'मेरा गांव पावर' की टीम पहले किसी ऐसे गांव की तलाश करती है, जहां बिजली का कोई इंतजाम न हो। इसके लोगों को केरोसिन से होने वाले नुकसान और माइक्रोग्रिड के बारे में बताती है। लोगों के राजी होने के बाद टीम माइक्रोग्रिड लगाने में जुट जाती है। सोलर प्लेट लगाने से लेकर घरों में कनेक्शन तक का सारा काम शाम होने से पहले कर दिया जाता है।
 
150 युवाओं को मिला रोजगार 
इस कंपनी के जरिए कई युवाओं को रोजगार भी मिला। इस कंपनी में फिलहाल 150 कर्मचारी हैं। कंपनी स्थानीय स्तर पर युवाओं की भर्ती करती है। इसमें लोअर लेवल से लेकर अपर लेवल तक के कर्मचारी हैं। उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार ही काम दिया जाता है। 
 
आगे की स्लाइड्स में पढ़िए, सरकार ने नहीं दी मदद... 
घर में खुश होकर पढ़ाई करता बच्चा। घर में खुश होकर पढ़ाई करता बच्चा।
 
संदीप पांडेय ने बताया कि अभी तक उन्हें केंद्र या राज्य सरकार से कोई मदद नहीं मिली है। उन्होंने कई बार प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। सरकारी रवैये से उदास संदीप ने कहा कि यदि सरकार मदद करे, तो वह लोगों को तेजी से सोलर लाइट उपलब्ध करा सकते हैं।
 
आगे की स्लाइड्स में देखिए, संबंधित फोटोज...
शाम होते ही बंद हो जाने वाली दुकानें अब देर रात तक खुलती हैं। शाम होते ही बंद हो जाने वाली दुकानें अब देर रात तक खुलती हैं।
माइक्रोग्रिड के उपकरण। माइक्रोग्रिड के उपकरण।
हर गांव में बनाया गया समूह साप्ताहिक रूप से बिल जमा करता है। हर गांव में बनाया गया समूह साप्ताहिक रूप से बिल जमा करता है।
'मेरा गांव पावर' के सीईअो संदीप पांडेय। 'मेरा गांव पावर' के सीईअो संदीप पांडेय।
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'मेरा गांव पावर' के फाउंडर संदीप, निखिल और ब्रीयन।'मेरा गांव पावर' के फाउंडर संदीप, निखिल और ब्रीयन।
एलईडी की रोशनी में पढ़ाई करते गांव के बच्चे।एलईडी की रोशनी में पढ़ाई करते गांव के बच्चे।
घर में खुश होकर पढ़ाई करता बच्चा।घर में खुश होकर पढ़ाई करता बच्चा।
शाम होते ही बंद हो जाने वाली दुकानें अब देर रात तक खुलती हैं।शाम होते ही बंद हो जाने वाली दुकानें अब देर रात तक खुलती हैं।
माइक्रोग्रिड के उपकरण।माइक्रोग्रिड के उपकरण।
हर गांव में बनाया गया समूह साप्ताहिक रूप से बिल जमा करता है।हर गांव में बनाया गया समूह साप्ताहिक रूप से बिल जमा करता है।
'मेरा गांव पावर' के सीईअो संदीप पांडेय।'मेरा गांव पावर' के सीईअो संदीप पांडेय।
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