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EXCLUSIVE: अब प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति पर भी उठे सवाल

प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे ने कहा, ‘मेरी जो नियुक्ति हुई है वह नियमानुसार हुई है। इसमें गलत कुछ भी नहीं है।’

Dainik Bhaskar

Jul 05, 2015, 04:46 PM IST
प्रदीप कुमार दुबे की फाइल फोटो। प्रदीप कुमार दुबे की फाइल फोटो।
लखनऊ. यूपी विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और पूर्व अध्यक्ष सुखदेव राजभर के रिश्तेदारों की अनियमित भर्ती के मामले के खुलासे के बाद अब प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जाता है कि प्रदीप कुमार दुबे प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्ति के समय तय आयु सीमा को पार कर चुके थे। उनकी नियुक्ति आयोग से न होकर सीधी भर्ती के जरिए हुई, जो सचिवालय सेवा नियमावली का उल्लंघन है। दूसरी ओर, इस खुलासे पर dainikbhaskar.com से प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे ने कहा, ‘मेरी जो नियुक्ति हुई है वह नियमानुसार हुई है। इसमें गलत कुछ भी नहीं है।’
उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) की नियमावली के अनुसार, विधानसभा में सचिव के पद पर नियुक्ति आयोग से ही की जा सकती है, लेकिन प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती सरीखी प्रक्रिया अपनाई गई। 25 जनवरी 2012 को सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन प्रकाशित हुए थे। इसके अनुसार अभ्यर्थी की अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष होनी चाहिए, जबकि उनकी जन्मतिथि के मुताबिक आवेदन के समय प्रदीप कुमार दुबे की आयु 52 वर्ष से अधिक थी, फिर भी बसपा सरकार में उन्हें प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्ति दे दी गई।

दुबे पर मेहरबान रही बसपा सरकार
प्रदीप कुमार दुबे को 13 जनवरी 2009 को प्रमुख सचिव संसदीय कार्य विभाग के पद पर नियुक्ति दी गई और फिर 19 जनवरी को ही एक नए आदेश के तहत उन्हें प्रमुख सचिव विधानसभा के पद में निहित सभी दायित्वों का निर्वहन करने की स्वीकृति भी दे दी गई। बसपा सरकार दुबे पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी। यही कारण है कि एक बार फिर 27 जून 2011 को उन्हें सेवा स्थानांतरण के आधार पर प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्त कर दिया गया और फिर जनवरी 2012 को प्रकाशित विज्ञापन के जरिए उन्हें प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियमित नियुक्ति हो गई।

दुबे की नियुक्ति का सपा ने किया था विरोध
प्रदीप कुमार दुबे की 2012 में प्रमुख सचिव के पद पर नियुक्ति के समय विपक्ष में रही समाजवादी पार्टी ने इसका जमकर विरोध किया था। खास बात ये है कि उस समय विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू थी, लेकिन इसे दरकिनार कर बसपा सरकार में भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया। उस समय सपा महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव ने भी नियमों का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर भर्ती प्रक्रिया रोकने की मांग की थी।

आगे की स्‍लाइड्स में पढ़िए, सपा सरकार बनने के बाद अखिलेश ने नहीं लिया संज्ञान

सीएम अखिलेश यादव की फाइल फोटो। सीएम अखिलेश यादव की फाइल फोटो।
हैरानी की बात यह है कि बसपा सरकार में नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तिों के मामले में सत्ता में आने के बाद भी सपा सरकार खामोश रही। जबकि, चुनाव के समय की गयी इन नियुक्तियों पर काफी हो हल्ला मचा था। प्रमुख सचिव विधायी और संसदीय कार्य प्रदीप दुबे की वीआरएस लेने के बाद पुनर्नियुक्ति भी कटघरे में थी, लेकिन सरकार बनने के बाद एकाएक मामला ही ठंडा पड़ गया।

क्या था विज्ञापन में
25 जनवरी 2012 को प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन में अभ्यर्थियों की अधिकतम उम्र सीमा 52 वर्ष और न्यूतम 35 वर्ष मांगी गई थी। इसमें यह भी प्रावधान किया गया था कि विधानसभा अध्यक्ष नियमों के तहत असाधारण परिस्थितियों में किसी अभ्यर्थी की आयु सीमा शिथिल कर सकते हैं।

 
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प्रदीप कुमार दुबे की फाइल फोटो।प्रदीप कुमार दुबे की फाइल फोटो।
सीएम अखिलेश यादव की फाइल फोटो।सीएम अखिलेश यादव की फाइल फोटो।
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