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कसम खाई तो उसकी लाज रखना, अभी रास्ते में मयखाना पड़ेगा

7 वर्ष पहले
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फोटो: दीप प्रज्‍जवलित करते हुए उदय प्रताप सिंह और डॉ. सुधाकर अदीब।

लखनऊ.
हिंदी की महायात्रा में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हमें अपनी मातृभाषा के प्रति अनुराग रखना चाहिए। जिस तरह हम अपने माता-पिता और पड़ोसियों का सम्मान करते हैं वैसे ही हिंदी का सम्मान भी करना चाहिए। हिंदी भाषा की ही देन है सूचना क्रांति। यह बातें हिंदी संस्‍थान के निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब ने कहीं। वो 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित भारतेंदु हरिशचंद्र के स्‍मृति समारोह में शामिल हुए।

रविवार को यूपी हिंदी संस्‍थान के कार्यकारी अध्‍यक्ष उदय प्रताप सिंह की अध्‍यक्षता में हिंदी भवन के निराला साहित्‍य केंद्र, सभागार में 11 बजे हिंदी दिवस के उपलक्ष्‍य में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन, मां सरस्वती की प्रतिमा और हरिशचंद्र के चित्र पर पुष्‍पांजलि अर्पित कर हुई। कार्यक्रम में कविता पाठ करते हुए उदय ने कहा 'हमें किस-किस को समझाना पड़ेगा, जो आया है उसे जाना पड़ेगा। इरादा और हिम्मत साथ दें तो, मुकद्दर को बदल जाना पड़ेगा।''कसम खाई तो उसकी लाज रखना, अभी रास्ते में मयखाना पड़ेगा।' कार्यक्रम में शामिल अन्‍य कवियों ने भी कविता पाठन किया।

कंप्‍यूटर ने भी बढ़ाया हिंदी को

'सूचना क्रांति और हिंदी' पर प्रसिद्ध साहित्यकार विजय मल्होत्रा ने कहा तमिल नेता गोपाल स्वामी आयंगर ने राजभाषा हिंदी के विकास के लिए काफी प्रयास किया। आज यूनिकोड के माध्यम से हिंदी के प्रयोग और उपयोग में आने वाली विभिन्न समस्याओं का निस्‍तारण सरलतापूर्वक किया जा रहा है। इसमें कंप्‍यूटर ने भी अपनी सहभागिता निभाई है।

हिंदी को अंग्रजी से आगे लाना होगा

वरिष्ठ साहित्यकार के. विक्रमराव ने कहा हिंदी दिवस नहीं होता तो हिंदी को याद कैसे किया जा सकता था। साल 1796 में पहली बार हिंदी छापाखाना आया। इसके बाद काफी संघर्ष करने के बाद हमारी मातृभाषा इस मुकाम तक पहुंची है। ऐसे में हिंदी को अंग्रेजी से भी आगे लाने के लिए और प्रयास करने होंगे। इस भाषा को प्रोत्‍साहित करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। इसके लिए नए-नए शब्‍दों को ग्रहण और समाहित करने वाले शब्दकोशों का निर्माण होना चाहिए। इसमें शासन और प्रशासन को भी मदद करनी चाहिए।

आगे पढ़िए भाषा को झरने की तरह बहने देना चाहिए...