तस्वीर में: राजधानी के राजकीय बाल गृह (शिशु) परिसर में गेट की तरफ देखते बच्चे।
लखनऊ. राजधानी के राजकीय बाल गृह (शिशु) में रहने वाले मासूमों को अपनी मां की लोरी और पापा के प्यार का इंतजार है। आए दिन यहां बच्चे अपनी मम्मी-पापा के आने की चाह में टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। हालांकि, शायद ही किसी बच्चे की यह अरमान पूरी होती हों। यहां रहने वाले शिक्षक उन्हें ये कहकर तसल्ली देते हैं कि उनके मम्मी-पापा बहुत ही जल्द आएंगे।
बताते चलें कि राजकीय बाल गृह (शिशु) में उन बच्चों को रखा जाता है जो अपनी मां-बाप से बिछड़ जाते हैं या फिर उन्हें जान-बूझकर कोई कहीं छोड़ देता है। ये बच्चे पुलिस या फिर सोशल वर्कर के माध्यम से यहां पर आते हैं। यहां पर इनकी देखभाल की जाती है।
क्या कहते हैं राजकीय बाल गृह (शिशु) के अधीक्षक
लखनऊ के बालू अड्डा में खुले राजकीय बाल गृह (शिशु) के अधीक्षक हरीश कुमार बताते हैं कि यहां पर रहने वाले बच्चों को भी अपनी मम्मी-पापा की याद सताती है। कई बार वे उनके पास जाने की जिद करते हैं। ऐसे में उन्हें काफी समझाना पड़ता है। कई बार समझाना मुश्किल भी हो जाता है, लेकिन फिर किसी तरह से उन्हें खिलौना और फल जैसी चीजें देकर फुसलाते हैं।
मम्मी-पापा से मिलने के लिए व्याकुल रहते हैं बच्चे
हरीश कुमार कहते हैं कि कुछ बच्चों को जब लोग गोद लेने आते हैं तो दूसरे बच्चों को यह कहकर समझाते हैं कि देखो इनके मम्मी-पापा इन्हें लेने आए हैं। अब तुम्हारे मम्मी-पापा भी तुम्हें लेने आएंगे। फिर भी उन बच्चों को समझाना मुश्किल हो जाता है जो बच्चे चार साल से ज्यादा के होते हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग ज्यादा से ज्यादा चार साल तक के बच्चों को ही गोद लेना चाहते हैं।
आगे पढ़िए बच्चों को गोद लेने से पहले यहां आने वाले लोगों को राजकीय बाल गृह (शिशु) के शर्तेां को करना पड़ता है पूरा…