--Advertisement--

DB Reality Check: 4 साल में 700 करोड़ खर्च, फिर भी ओडीएफ नहीं हुए गंगा किनारे बसे गांव

पंचायती राज विभाग ने 5 अक्टूबर को एलान क‍िया कि 25 जिलों के 1627 गांव ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) हो चुके हैं।

Dainik Bhaskar

Oct 31, 2017, 04:57 PM IST
DainikBhaskar.com ने वाराणसी, मिर्जापुर, इ DainikBhaskar.com ने वाराणसी, मिर्जापुर, इ

लखनऊ. पंचायती राज विभाग ने 5 अक्टूबर को एलान किया कि गंगा किनारे बसे 25 जिलों के 1627 गांव ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) हो चुके हैं। इसपर विभागीय मंत्री ने भी अपनी मुहर लगाई थी। DainikBhaskar.com की टीम ने इसका रियलिटी चेक किया तो हकीकत कुछ और निकली। 2013-14 से 2017-18 तक लगभग 700 करोड़ रुपए (6775884000 करोड़ रुपए) खर्च के बाद भी कई गांव में 30 से 40% टॉयलेट का निर्माण नहीं हुआ है। जबकि, सरकारी आंकड़ों में 100% काम पूरा हो चुका है। लेकिन टॉयलेट की तस्वीरें अपलोड नहीं की गईं। DainikBhaskar.com ने वाराणसी, मिर्जापुर, इलाहाबाद, कन्नौज और शाहजहांपुर में गंगा किनारे बसे गांव का रियलिटी चेक किया।

#जिला: वाराणसी
#बजट: 38,94,12,000 रुपए खर्च
#कितने गांव: 55 गांव ओडीएफ घोषित

#क्या कहना है गांव वालों का
- बभनपूरा के बेचू ने बताया- हमारे घर केवल एक टॉयलेट बना है और सदस्यों की संख्या 24 है। मेरे तीन लड़के हैं और तीनों की शादियां हो चुकी हैं। सभी के बच्चे हैं। सुबह अपने टॉयलेट पर हमें मुंबई के चाल की तरह लाइन लगाना पड़े, इससे अच्छा बाहर हो लो।
- इसी गांव के प्रधानपति गौरव सिंह ने बताया- आज भी 10% लोग खुले में शौच जाते हैं। अभी भी 100 से ऊपर टॉयलेट्स की आवश्यकता है। गांव की आबादी लगभग 4000 है लेकिन 300 टॉयलेट ही बने हैं। सरकारी भवनों की सफाई के लिए एक सफाई कर्मचारी भी है। यहां के कुछ लोग टॉयलेट्स को चारागाह के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। नाली न होने के कारण टॉयलेट के बाहर गंदगी का अंबार है।
- कमौली गांव की आबादी 6000 के करीब है। यहां 350 टॉयलेट बने हैं। प्रधानपति जगदीश राजभर ने बताया- 20% लोग आज भी शौच करने बाहर जाते हैं। 200 टॉयलेट की और जरूरत है। पूर्व कन्या विद्यालय कमौली में तो टायलेट का पॉट गंदगी से पटा होने के कारण दिखाई भी नहीं दिया।
- ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया- सफाई कर्मी एक ही है, जो प्रधान के घर लगा रहता है। हालांकि, प्रधानपति जगदीश ने इन आरोपों को गलत बताया।
-चांदपुर गांव की आबादी करीब 6500 है। टॉयलेट लगभग 300 बने हैं। प्रधान प्रमोद यादव के भतीजे श्याम ने बताया- 15% लोग बाहर जाते हैं। 150 टॉयलेट की आवश्यकता अब भी है।

क्या है टॉयलेट बनवाने का प्रोसेस
- पंचायती राज के अफसरों के अनुसार- पंचायती राज निदेशालय से जिला ग्राम पंचायत के खाते में पैसा दिया जाता है। वहां से जिस ग्राम पंचायत में टॉयलेट की आवश्यकता होती है वहां से प्रधान और सेक्रेटरी के माध्यम से पैसा उपलब्ध कराया जाता है।
- लाभार्थी को पैसा 2 तरह से मिलता है- एक प्रधान और सेक्रेटरी, दूसरा सीधे लाभार्थी के खाते में। लेकिन लाभार्थी कभी-कभी पैसा अपने पर्सनल काम के लिए खर्च कर लेता है इसलिए ज्यादातर प्रधान और सेक्रेटरी के माध्यम से ही रुपया दिया जाता है।

टॉयलेट बनवाने की जिम्मेदारी किसकी है...
- टॉयलेट बन गया या नहीं। टॉयलेट का ग्रामीण यूज कर रहे या नहीं। कहीं ग्रामीण टॉयलेट बनवा कर बाहर शौच के लिए तो नहीं जा रहा है। इसकी मॉनिटरिंग भी गांव लेवल पर ग्राम प्रधान और सेक्रेटरी की है। ग्राम पंचायत लेवल पर एडीओ पंचायत, जिला लेवल पर डीपीआरओ (जिला पंचायत राज अधिकारी), सीडीओ और जिले के डीएम की जिम्मेदारी है। इसके बाद निदेशक पंचायती राज की जिम्मेदारी है।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें मिर्जापुर, इलाहाबाद, कन्नौज और शाहजहांपुर के गांवों के बारे में...

X
DainikBhaskar.com ने वाराणसी, मिर्जापुर, इDainikBhaskar.com ने वाराणसी, मिर्जापुर, इ
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..