लखनऊ. मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में पैदा होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। वृषभ पर सवार माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित हैं | ये नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। ये पूर्व जन्म में शिवप्रिया सती के नाम से विख्यात थीं, जिन्होंने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया था। इनका जन्म हिमांचल में हुआ था। हिमसुता होने के कारण इन्हें शैलपुत्री और पार्वती दोनों नाम से जाना जाता है।
गुरूवार से शुरू हुए नवरात्रि में पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पंडित राकेश पांडेय ने बताया कि अपने भाषा के अनुसार मां भगवती की आराधना करनी चाहिए। दिन में एक बार फलाहार लेने के साथ रात्रि काल में विज्ञ जन नव आवृति रात्रिसूक्त का पाठ भी करना चाहिए। कलश के दाहिनी तरफ अखंड दीप जलाना चाहिए।। सुबह और शाम मां भगवती की आरती कर भोग लगाना चाहिए। नवमी तिथि में गोदुग्ध से निर्मित पायस में त्रिमधु मिलाकर और काले तिल से हवन करना चाहिए। इस दौरान जौ की आहुति नहीं देनी चाहिए।
ऐसे करे मां शैलपुत्री की पूजा
सबसे पहले चौकी पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापित करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की भी स्थापना की जानी चाहिए।
इसके बाद 'ओम शैल पुत्रैय नम:' एकाक्षरी बीज मंत्र का जाप करना चाहिए। देवी को सफेद पुष्प अर्पित करें। इनकी आराधना से शिव-शक्ति को बोध होता है। मां शैलपुत्री की आराधना से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है और दांपत्य सुख का लाभ मिलता है।
फोटो: नवरात्रि के पहले दिन बड़ी काली मंदिर में देवी के दर्शन के लिए जुटी भक्तों की भीड़।