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इस मंदिर में प्रणय मुद्रा में हैं शिव-पार्वती, सावन में मूर्ति पर चढ़ाया जाता है पानी

सोनभद्र जिले को सोनभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहां के निवासी मानते हैं कि यहां की चट्टानों में भगवान शंकर के आसन की छवि दिखाई देती है।

Dainik Bhaskar

Aug 09, 2015, 03:30 PM IST
शिवद्वार में स्थापित प्रणय मुद्रा में शिव-पार्वती की मूर्ति। शिवद्वार में स्थापित प्रणय मुद्रा में शिव-पार्वती की मूर्ति।
लखनऊ. यूपी के दक्षिणी हिस्से में स्थित सोनभद्र जिले में भगवान शंकर और पार्वती की एक दुर्लभ मूर्ति स्थापित है। हेडक्वॉर्टर राबर्ट्सगंज से लगभग 40 किमी. की दूरी पर घोरावल कस्बे के शिव मंदिर में ये मूर्ति स्थापित है। इसकी खासियत ये है कि इसमें शिव-पार्वती प्रणय मुद्रा में दिखाई पड़ रहे हैं। ये प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है। कहा जाता है कि ये दुनिया में भगवान शंकर की अकेली ऐसी मूर्ति है। यहां शिवलिंग पर जल नहीं, बल्कि मूर्ति पर चढ़ाया जाता है।

सोनभद्र जिले को सोनभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहां के निवासी मानते हैं कि यहां की चट्टानों में भगवान शंकर के आसन की छवि दिखाई देती है। मान्यता है कि अहंकार के कारण दक्ष प्रजापति ने देवाधिदेव शिव को अनुष्ठान में नहीं बुलाया था। पति के अपमान से दुखी सती ने पिता के अहंकार का नाश करने के लिए अपनी देह का त्याग कर दिया। इससे क्रोधित होकर शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र की उत्पत्ति की और उसे दक्ष का वध करने का आदेश दिया। वीरभद्र ने दक्ष का वध कर दिया तो वहीं, शिव के गणों ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया।
शिव ने लगाया बकरे का सिर
बाद में देवताओं के समझाने पर शिव ने दक्ष के कटे सिर की जगह बकरे का सिर लगा दिया। दक्ष के अहंकार को चूर-चूर करने के बाद भगवान शंकर पार्वती के सती होने के चलते बड़े ही दुखी मन से वहां से चले गए। कहते हैं इसके बाद शिव ने सोनभूमि का रुख किया। यहां शिव ने अगोरी क्षेत्र में कदम रखा। जहां शिव ने इस इलाके में सबसे पहले चरण रखे, उसे आज शिवद्वार के नाम से जाना जाता है। यहां अगोरी क्षेत्र में उन्होंने अज्ञातवास का फैसला लिया। शिव के गुप्त स्थान पर अज्ञातवास करने के चलते इस क्षेत्र को 'गुप्तकाशी' के नाम से जाना जाता है।
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ये प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है। ये प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है।
यहां सावन में मूर्ति पर चढ़ता है जल
राबर्ट्सगंज के रहने वाले सुनील उपाध्याय बताते हैं कि सावन के महीने में पूरे देश में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा है, लेकिन शिवद्वार में ही मूर्ति पर जल चढ़ाया जाता है। वे बताते हैं कि यहां काले पत्थर से बनी शिव-पार्वती की मूर्ति अलौकिक है। देश में शायद ही कहीं और शिव की ऐसी प्रतिमा देखने को मिले। ये ग्यारहवीं शताब्दी में बनी लास्य शैली की मूर्ति है।
 
भक्तों की लगती है भारी भीड़
इस मंदिर में सावन, बसंत पंचमी और शिवरात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। सावन के महीने में यहां कांवड़िेये मीरजापुर में गंगा नदी से और विजयगढ़ किले में स्थित तालाब से जल लाकर मूर्ति पर चढ़ाते हैं। यहां मंदिर परिसर में श्रद्धालु अपनी मनौतियां पूरी होने पर कथा के साथ-साथ मुंडन और शादी जैसे आयोजन भी करते हैं।
 
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मंदिर के पास पड़ी खंडित मूर्ति। मंदिर के पास पड़ी खंडित मूर्ति।
मंदिर के पास पड़ी हैं कई खंडित मूर्तियां
सुनील के मुताबिक, मंदिर के आसपास कई खंडित मूर्तियां पड़ी हुईं हैं। इन्हें देखकर लगता है कि ये सभी या तो सोढरीगढ़ दुर्ग में मिलीं थीं या आस-पास के खेतों से खुदाई के दौरान मिली होंगी, जिन्हें लोग मंदिर के पास छोड़ गए। वे बताते हैं कि शिव और पार्वती की ये मूर्ति भी खुदाई के दौरान ही मिली थी, जिसे आदि शंकराचार्य ने यहां स्थापित कराया और बाद में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। मान्यता है कि शिव भक्तों के लिए काशी के बाद इसी स्थान का सबसे ज्यादा महत्व है। यहां देश के कोने-कोने से लोग दर्शन करने आते हैं।
 
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खेतों से खुदाई के दौरान मिली थीं ये मूर्तियां। खेतों से खुदाई के दौरान मिली थीं ये मूर्तियां।
सावन में शिवलिंग पर नहीं मूर्ति पर चढ़ाया जाता है पानी। सावन में शिवलिंग पर नहीं मूर्ति पर चढ़ाया जाता है पानी।
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शिवद्वार में स्थापित प्रणय मुद्रा में शिव-पार्वती की मूर्ति।शिवद्वार में स्थापित प्रणय मुद्रा में शिव-पार्वती की मूर्ति।
ये प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है।ये प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनी है।
मंदिर के पास पड़ी खंडित मूर्ति।मंदिर के पास पड़ी खंडित मूर्ति।
खेतों से खुदाई के दौरान मिली थीं ये मूर्तियां।खेतों से खुदाई के दौरान मिली थीं ये मूर्तियां।
सावन में शिवलिंग पर नहीं मूर्ति पर चढ़ाया जाता है पानी।सावन में शिवलिंग पर नहीं मूर्ति पर चढ़ाया जाता है पानी।
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