प्रतीकात्मक तस्वीर
लखनऊ. यूपी उपचुनाव में जहां भाजपा को खोने के लिए दस सीटें हैं तो पाने के लिए सिर्फ एक सीट है। जबकि सपा के पास खोने के लिए एक सीट है तो पाने के लिए दस सीट। बहरहाल, कौन पाएगा और कौन खोएगा यह दो दिन बाद पता चलेगा। इसके साथ ही इस सवाल का जवाब भी मिलेगा कि मैदान में न उतरने वाली बसपा का वोट बैंक किसके खाते में गया है। यही नहीं यह परिणाम कइयों का भविष्य भी तय करेंगे।
सबके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बसपा का वोट बैंक किस करवट बैठेगा। इसके लिए थोड़ा सा पीछे जाने की जरूरत है। आम लोकसभा चुनावों में बसपा का वोटबैंक ऐसा खिसका कि यूपी में उसका सूपड़ा साफ़ हो गया। दरअसल बसपा का वोट बैंक खिसकने का सिलसिला आम चुनावों से ही नहीं शुरू हुआ है बल्कि यह सिलसिला 2007 के बाद से ही शुरू हो गया था।
हर चुनाव में घट रहा है वोट प्रतिशत
साल 2007 में हुए विधान सभा चुनाव का परिणाम देखा जाए तो इस चुनाव में बसपा को लगभग 30% वोट मिला था। जबकि 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में यह प्रतिशत घटकर 26% रहा था। 2009 लोकसभा चुनावों में माया का वोट प्रतिशत 27% था, लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों में यह घटकर लगभग 19% रह गया और यूपी में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इससे साफ़ जाहिर है कि बसपा का वोट बैंक छिटका है।
बसपा ने निर्दलियों को ट्रांसफर किया वोट बैंक
अब जब उपचुनावों के बहाने उसे बटोरने का मौका मायावती को मिला था तो उन्होंने उपचुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया। उन्होंने निर्दलियों को अपना वोट बैंक ट्रांसफर करने की बात कही है। लेकिन, सवाल यही है कि ईवीएम में हाथी निशान पहचानने वाला माया का वोटर निर्दलीय को अपना वोट दे पाएगा। बहरहाल जो भी हो यह तो 16 सितंबर को तय होगा कि बसपा का वोट बैंक किसके खाते में जाएगा।
आगे पढ़िए बसपा के वोट बैंक पर भाजपा और सपा की नजर...