लखनऊ. यूपी की 11 विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में बसपा सुप्रीमो मायावती ने निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देने का आदेश दिया था। लेकिन उपचुनाव के नतीजों ने एक परंपरागत वोट बैंक दावे की पोल खोल दी है। उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की हुई करारी हार से अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या मायावती के सिपहसलारों ने विजयी उम्मीदवारों से सांठगांठ कर ली थी या फिर उनके आदेश को जनता ने कोई अहमियत नहीं दी?
चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो, नौ सीटों पर सपा और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला रहा। रोहनियां सीट पर सपा को अपना दल ने टक्कर दी। चरखारी में सीधा मुकाबला सपा और कांग्रेस उम्मीदवारों के बीच रहा। निर्दली उम्मीदवारों को मिले वोट का आंकलन करें तो अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है। निर्दलियों को मिले बेहद कम वोट से साफ हो गया है कि, बसपा के वोट बैंक ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। याद दिला दें कि, इन 11 सीटों में अधिकांश सीटों पर साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवारों ने बीजेपी के विजयी प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दी थी।
मायावती ने पहले ही घोषित कर दिया था कि, पार्टी उपचुनाव नहीं लड़ेगी। उन्होंने उपचुनाव में किसी भी राजनीतिक पार्टी को समर्थन नहीं देने का ऐलान किया था। बसपा सुप्रीमो ने जिन सीटों पर चुनाव होने थे, वहां के पार्टी जिलाध्यक्षों को निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देने का आदेश दिया था। हालांकि, पार्टी पदाधिकारियों को सख्त हिदायत दी गई थी कि वे उम्मीदवारों की प्रचार रैलियों या जनसभाओं में शामिल नहीं होंगे। उपचुनाव के नतीजों से सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर बसपा का वोटबैंक किसके पाले में गया?
इधर, बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने आरोप लगाया है कि, बसपा ने सपा और कांग्रेस से छुपा समझौता किया था। वाजपेयी के अनुसार वे जनता के फैसले का स्वागत करते हैं। उपचुनाव में मिली पराजय की पार्टी समीक्षा करेगी और अगामी रणनीति बनाई जाएगी। कांग्रेस प्रवक्ता द्वीजेंद्र त्रिपाठी ने वाजपेयी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि सपा और बीजेपी में सत्ता में बने रहने का गुप्त समझौता है। बीजेपी अपनी कमजोरियां छुपाने के लिए दूसरे दलों पर गलत बयानबाजी कर रही है।
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