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संविधान के तहत परीक्षण के बाद ही लोकायुक्त बिल को मंजूरी देंगे राज्यपाल

लोकायुक्त संशोधन बिल में चीफ जस्टिस की भूमिका खत्म कर दी गई है।

Dainik Bhaskar

Aug 27, 2015, 09:44 PM IST
राज्यपाल राम नाइक की फाइल फोटो। राज्यपाल राम नाइक की फाइल फोटो।
लखनऊ. राज्यपाल राम नाईक ने गुरुवार को विधानसभा में लोकायुक्त और उप लोकायुक्त संशोधन बिल 2015 पास होने पर कहा है कि उनके पास जब ये मंजूरी के लिए आएगा, तो उसपर संविधान के मुताबिक परीक्षण के बाद फैसला करेंगे। संशोधित बिल में सरकार ने लोकायुक्त चयन में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजे) की भूमिका खत्म कर दी है। नए बिल के मुताबिक अब सीएम, नेता विपक्ष और विधानसभा अध्यक्ष मिलकर एक रिटायर्ड जस्टिस को चुनेंगे और फिर उस जस्टिस के साथ मिलकर लोकायुक्त चुना जाएगा। इससे पहले 1975 में बने लोकायुक्त बिल में चीफ जस्टिस की भी नियुक्ति में भूमिका थी। राज्यपाल ने इस पर भी खुशी जताई कि गुरुवार को जब वह विधानसभा और विधान परिषद गए थे, तो वहां न किसी ने नारेबाजी की और न कोई वेल में विरोध जताने आया।
चीफ जस्टिस ने जताई थी लोकायुक्‍त के चयन पर आपत्ति
इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने रवींद्र सिंह को लोकायुक्त बनाने पर अपनी स्वीकृति नहीं दी थी। चीफ जस्टिस का कहना था कि जस्टिस रवींद्र सिंह को कई बार सपा के नेता और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के साथ सार्वजनिक मंच पर देखा गया है। उनकी इसी राय को राज्यपाल ने चौथी बार रवींद्र सिंह का नाम ठुकराते वक्त फाइल पर नोटिंग भी कर दी थी।
साल 2012 में भी सरकार कर चुकी है एक्‍ट में संशोधन
2012 से पहले यूपी लोकायुक्त एक्ट के मुताबिक लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल का होता था। जि‍समें इस बात का जि‍क्र था कि लोकायुक्त के पद से हटने के बाद वह व्यक्ति किसी भी तरह का कोई पद स्वीकार नहीं करेगा। 2012 में सीएम बनने के बाद अखिलेश ने एक्ट में संशोधन कर लोकायुक्त और उप लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाकर आठ साल कर दिया। जब तक नए लोकायुक्त की तैनाती नहीं होती है, तब तक पुराने लोकायुक्त काम करते रहते हैं। लोकायुक्त कानून के सेक्शन 5 (3) में भी संशोधन किया गया। जि‍सके मुताबिक लोकायुक्त पद पर कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति ये पद दोबारा स्वीकार कर सकता है। इस संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लग चुकी है।
पहले चीफ जस्टिस भी थे चयन समिति में
अब तक जो लोकायुक्त और उप लोकायुक्त बिल था, उसमें लोकायुक्त का चयन तीन सदस्यों की कमिटी करती थी। इस कमिटी में सीएम, नेता विपक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हुआ करते थे। तीनों मिलकर नामों के एक पैनल में से किसी एक रिटायर्ड जस्टिस का चयन लोकायुक्त के तौर पर करते थे। चुने हुए नाम को मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाता था। राज्यपाल की मुहर लगने के बाद लोकायुक्त की नियुक्ति होती थी।
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राज्यपाल राम नाइक की फाइल फोटो।राज्यपाल राम नाइक की फाइल फोटो।
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