लखनऊ. भ्रष्टाचार की पोल खोल कर भी यूपी के लोकायुक्त लाचार महसूस कर रहे हैं। उनका दर्द यह है कि जटिल न्यायिक प्रक्रियाओं के कारण आरोपी या तो बच जाते हैं या फिर उन्हें सजा मिलने में विलंब होती है। ऐसे में वे भयमुक्त होकर फिर से भ्रष्ट कारगुजारियों को अंजाम देने में जुट जाते हैं।
यूपी के लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा स्मारक और चीनी घोटाले जैसे बड़े मामलों की जांच कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना तभी संभव है, जब अपराधियों पर तत्काल कठोर कार्रवाई हो। यदि उन पर कार्रवाई होती है भ्रष्टाचारियों में भय पैदा होगा। वे ऐसे कृत्य से डरेंगे। ऐसों पर कठोर कार्रवाई नहीं होने से उनके हौसले बढ़ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि कानूनी प्रक्रिया लंबी न खींचे और घोटालेबाजों पर सख्त कार्रवाई हो तो भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। dainikbhaskar.com की टीम से खास बातचीत में उन्होंने सोमवार को अपनी बेबाक राय रखी। वे अपनी जांचों में स्मारक घोटाले को सबसे बड़ा मामला बताते हैं। राज्य में हुए एक हजार करोड़ रुपए के चीनी घोटाले को भी वे बड़ा भ्रष्टाचार मानते हैं। उन्होंने कहा- 'मेरी रिपोर्ट आने के बाद कुछ भय पैदा हुआ लेकिन नतीजा नहीं निकला।'
नतीजा नहीं निकलने की वजह
उन्होंने कहा कि नतीजा नहीं आने की वजह है। उनके बाद मामले की जांच चार एजेसियां भी करती हैं। इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। लोकायुक्त की जांच के बाद सत्ता के राजनेता मामले पर निर्णय लेते हैं। उसके बाद सीआरपीसी की अधिकृत जांच एजेसियों को फाइनल रिपोर्ट लगाने या चार्जशीट दाखिल करने का अधिकार होता है। मामला कोर्ट में जाता है। अंतिम में सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होती है। सुप्रीम कोर्ट में जब हार जाते हैं, तब ट्रायल शुरू होता है। इन चार एजेंसियों के कारण अड़चन आती है। फैसले में विलंब होने के कारण भ्रष्टाचारियों के मन से भय खत्म हो जाता है। वे फिर से भ्रष्ट कामकाज को अंजाम देने लगते हैं।
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