लखनऊ. संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) से कैडिवर अंग लेकर प्रत्यारोपण किए जाने के 24 घंटे के अंदर मरीज की हुई मौत के 120 घंटे बाद परिजनों ने पीजीआई पहुंच कर हंगामा काटा। परिजनों का आरोप था कि महिला की मौत खराब कैडिवर लगाने की वजह से हुई थी। वहीं, ट्रांसप्लांट करने वाले डॉक्टर ने फैमिली नॉन फंक्शनल का केस बताते हुए इन आरोपों को खारिज कर दिया है।
एक सप्ताह पहले गोरखपुर निवासी धर्मवीर को सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद इलाज के लिए केजीएमयू लाया गया था। इस दौरान वेंटीलेटर पर रखे जाने के बावजूद वह ब्रेन डेड हो गया था। इसके बाद शताब्दी अस्पताल में ट्रामा सेंटर के प्रभारी और यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डा. एसएन शंखवार सहित डॉक्टरों की टीम ने लीवर और किडनी को निकाल कर सुरक्षित तरीके से उसे पीजीआई पहुंचाया था। यह निर्णय पूरी तरह से परिजनों की सहमति के बाद ही लिया गया था।
ट्रांसप्लांट करने वाले विभागाध्यक्ष से भीड़े परिजन
पीजीआई में तीन मरीजों में लीवर और किडनी का ट्रांसप्लांट किया गया था। इसमें दो महिलाएं भी शामिल थीं। लीवर ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को पोस्ट ऑपरेटिव आईसीयू में रखा गया था, जहां पर महिला की मौत हो गई थी। इसके 120 घंटे बाद परिजनों ने शनिवार को सर्जिकल गैस्ट्रो एंट्रोलॉजी विभाग में चल रहे कार्यक्रम के बीच पहुंच कर हंगामा काटा। हंगामा कर रहे परिजन खराब लीवर ट्रांसप्लांट करने का आरोप लगा रहे थे। इस दौरान परिजन ट्रांसप्लांट करने वाले विभागाध्यक्ष प्रो. राजन सक्सेना से भी उलझ गए। करीब दो घंटे के हंगामे की सूचना पाकर जब अधिकारी मौके पर पहुंचे तब जाकर मामला शांत हुआ।
लीवर ट्रांसप्लांट से पहले हुआ था बायोप्सी
अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए सर्जिकल गैस्ट्रो एंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. राजन सक्सेना ने बताया कि जिस महिला का ट्रांसप्लांट किया गया था, उसने पहले बायोप्सी भी कराई थी। बायोप्सी की रिपोर्ट आने के बाद ही ट्रांसप्लांट किया गया था। इस दौरान ऑपरेशन थियेटर में उनका एक रिश्तेदार भी था। उन्होंने बताया कि यह फैमिली नॉन फंक्शनल का केस है। ऐसे केसों में विकल्प के तौर पर तुरंत दूसरे कैडिवर की जरूरत होती है। समय इतना कम था कि कैडिवर की व्यवस्था किया जाना संभव नहीं था।
हंगामा साजिश तो नहीं
महिला मरीज की मौत के 120 घंटे बाद परिजनों द्वारा पीजाआई पहुंच कर हंगामा करने के पीछे संस्थान के कर्मचारी इसे साजिश करार दे रहे हैं। कर्मचारियों ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आमतौर पर मरीज की मौत के तुरंत बाद ही परिजन हंगामा करने लगते हैं। जबकि इस मामले में पांच दिन बाद आकर हंगामा करना उकसावे की प्रवृत्ति को उजागर करता है। हालांकि इस मामले में प्रो. राजन सक्सेना ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।
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