लखनऊ. लखनऊ ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन एवं कालेज के संयुक्त तत्वाधान में रविवार को कूल्हे की चोट के आपरेशन पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। एराज मेडिकल कॉलेज में हुए इस कार्यशाला का उद्घाटन एम्स पटना के निदेशक डा. जीके सिंह ने किया। इस अवसर पर फोर्टिस हॉस्पीटल चंडीगढ़ और एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों ने मृत शरीर पर कूल्हे की चोट के पेल्वी एसिटाबुलर सर्जरी का सजीव प्रसारण कर उपस्थित डॉक्टरों को ट्रेनिंग दिया।
कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर एम्स पटना के निदेशक डा. जीके सिंह ने कहा कि सड़क दुर्घटना में चोटिल तीन से चार फीसदी ऐसे मरीज होते हैं, जिनके कूल्हे की हड्डी टूट जाती है। आमतौर पर कूल्हे की हड्डी टूटने पर व्यक्ति विकलांग हो जाता है। लेकिन, अब इस सर्जरी के माध्यम से वह सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है।
कार्यशाला के दौरान फोर्टिस हॉस्पीटल चंडीगढ के डा. रमेश सैन ने बताया कि इस सर्जरी में मरीज के कमर के निचले हिस्से में चीरा लगाकर भीतर के लिगामेंट को जोड़ने के साथ ही हड्डी में विशेष प्रकार के मेंटल इम्प्लांट लगाए जाते हैं। इसके बाद कूल्हे की हड्डी पहले की तरह हो जाती है। उन्होंने बताया कि अब तक जो सर्जरी होती थी उसमें यह पूरी तौर पर ठीक से काम नहीं करता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
घटना के कुछ दिन बाद सर्जरी सफल नहीं
कार्यशाला में एम्स दिल्ली के डा. विवेक त्रिखा ने बताया कि घटना के अधिक दिन बितने के बाद मरीज की सर्जरी सफल नहीं हो सकती है। इसलिए, प्रभावित व्यक्ति को जल्द से जल्द ऑर्थोपेडिक सर्जन के पास ले जाना चाहिए। कार्यशाला के दौरान उन्होंने मृत शरीर के कूल्हे का सजीव आपरेशन कर दिखाया। उन्होंने बताया कि इसमें मरीज की तीन से सात दिन के अंदर सर्जरी आवश्यक है।
काफी कम विशेषज्ञ हैं
कार्यशाला के सेक्रेटरी डा. हरीश मक्कड ने बताया कि आमतौर पर इस सर्जरी से ऑपरेशन करने वाले विशेषज्ञ काफी कम संख्या में है। उन्होंने बताया कि ऐसे चोट में व्यक्ति के अंदर ही खून का रिसाव होने लगता है। ऐसे में डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने के नजरिए से इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है।
तस्वीर में: कार्यशाला को संबोधिक करते विशेषज्ञ।