फोटो: मेले के दौरान रंग बिरंगी लाइटों से चमकती सहारनपुर की गंगा नदी।
सहारनपुर. अपने पिृत पक्ष को मनाने के लिए लोगों द्वारा न केवल हरिद्वार बल्कि इलाहाबाद और उज्जैन का सफर भी तय किया जाता है। ऐसे में सहारनपुर की गंगा में पितृ तर्पण करने का अलग ही महत्व है। यहां पर सामूहिक रुप से पितृ तर्पण किया जाता है। यहां बह रही गंगा को पांवधोई के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि एक योगीराज की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर मां गंगा यहां पर स्वयं चल कर आई थीं। जिस प्रकार राजा भागीरथ की तपस्या पर भगवान शंकर की जटा से गंगा निकली थी, उसी प्रकार योगीराज बाबा लाल दास के आग्रह पर मां गंगा यहां प्रकट हुई थी।
श्राद्ध पक्ष के दौरान प्रत्येक दिन यहां सैकड़ों लोग दूर-दूर से अपने पितृजनों का तर्पण करने के लिए पहुंचते हैं। यहां पर अमावस्या के दिन सामूहिक रुप से पितृ तर्पण करने के लिए मेला लगता है। पंडित योगेश पाठक बताते हैं कि वे पांवधोई नदी पर पिछले कई सालों से पितृ तर्पण कराते आ रहे हैं। ऐसे में यहां किसी भी व्यक्ति से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।
पितृ तर्पण करने वाले व्यक्ति को केवल अपने साथ एक किलो गेहूं का आटा, आधा किलो काले तिल, 16 पत्तल और कुछ फल अपने साथ लाने होते हैं। वह बताते हैं कि पितृ तर्पण का जो फल गंगा किनारे हरिद्वार और इलाहाबाद में मिलता है, वही फल जातक को यहां पर मिलता है।
क्या है ऐतिहासिक महत्व
सहारनपुर की गंगा के अस्तित्व के बारे में इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ा है। मंदाकिनी की इस पवित्र धारा ने अपने पावन जल से धरा सिंचित कर यहां के जन-जन को यह सौभाग्य प्रदान किया है। इसके मूल में एक सिद्ध योगी की गंगा के प्रति अटूट भक्ति के साथ-साथ अलग-अलग संप्रदाय के दो सिद्ध पुरुषों के बीच मित्रता की एक रोमांचक गाथा भी है। महंत भारतदास के अनुसार, बाबा लालदास महाराज मां गंगा के अनन्य भक्त थे। वह प्राय: अपने सभी शिष्यों के साथ गंगा के लिए प्रतिदिन हरिद्वार जाते थे और वहां काफी समय तक प्रवास भी करते थे। 16वीं शताब्दी में बाबा लालदास अपने शिष्यों के साथ स्नान करके लौटते हुए वन क्षेत्र से गुजरे तो यहां एक साफ-सुथरा जलाशय देखकर अपनी साधना स्थली के रुप में डेरा इसी स्थान पर बना लिया।
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