ब‍िसाहड़ा कांड: दो समुदायों के संबंधों की गहराई को दर्शाता है डॉक्युमेंट्री 'द ब्रदरहुड' / ब‍िसाहड़ा कांड: दो समुदायों के संबंधों की गहराई को दर्शाता है डॉक्युमेंट्री 'द ब्रदरहुड'

नोएडा: इस डॉक्युमेंट्री को पंकज पाराशर ने निर्देशित किया है, जो यूपी में दादरी के बिसाहड़ा कांड पर आधार‍ित है।

Aug 05, 2017, 06:20 PM IST
नोएडा. यूपी में दादरी के बिसाहड़ा कांड ने पूरी दुनिया के सामने हिन्दू और मुस्लिमों के बीच रिश्तों की जो तस्वीर दी, वह सिर्फ राजनीतिकरण था। जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल इतर और अलग है। यह दावा किया है ग्रेटर नोएडा में हिन्दू-मुस्लिम एकता और स्थानीय संस्कृति को पेश करती डॉक्युमेंट्री फ‍िल्म 'द ब्रदरहुड’, जल्द ही रिलीज होने वाली है। इस डॉक्युमेंट्री को पंकज पाराशर ने निर्देशित किया है। आगे पढ़‍िए क्या है पूरी कहानी...
-'द ब्रदरहुड’ सुनने में यह नाम जितना सादगी भरा है, उतनी ही एेतिहासिक इसकी कहानी है। महज 24 मिनट की इस डॉक्युमेंट्री में 1857 गदर के उन लमहों को भी पेश किया गया है, जिसमें दोनों समुदायों के बीच संबंधों की गहराई का पता चलता है।
-डॉक्युमेंट्री के डायरेक्टर पंकज पराशर ने dainikbhaskar.com से बातचीत में डॉक्युमेंट्री के उन पलों और उस गहराई को साझा किया जिसकी बदौलत वह दोनों समुदाय के बीच संबंधों की गहराई को उजागर करने में कामयाब रहे।
-उन्होंने बताया, 24 मिनट की डॉक्युमेंट्री दादरी के बिसाहड़ा गांव से शुरू होती है, जहां 28 सितम्बर 2015 की रात कुछ उन्मादी युवकों ने गौ हत्या की अफवाह पर अखलाक नाम के व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
-यह अकेली घटना इस क्षेत्र की वास्तविक तस्वीर नहीं है। इसमें भाटी गोत्र के हिदुओं और मुसलमानों के इतिहास को दिखाने के लिए जैसलमेर, सोमनाथ और ग्रेटर नोएडा के ऐतिहासिक स्थलों का फिल्मांकन किया गया है।
-1857 की क्रांति से जुड़ी कई ऐतिहासिक घटनाएं 'द ब्रदरहुड’ में देखने को मिलेंगी, जो वेस्ट यूपी के इतिहास में मायने रखती हैं। इनसे दोनों समुदायों के बीच संबंधों की गहराई पता चलती है।

365 गांवों का रहा एेतिहासिक इतिहास
-उन्होंने बताया, बिसाहड़ा से महज 10 किमी की दूरी पर गोढ़ी बछेड़ा और बुलंदशहर में तिलबेगमपुर गांव है। गोढ़ी बछेड़ा में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय और तिलबेगमपुर में मुस्लिम ठाकुर बाहुल्य है।
-1857 से यहां परंपरा काबिज है कि जब भी गोढ़ी-बछेड़ा में कोई शादी हुई, मुस्लिम ठाकुर के यहां से ही चांदी का एक सिक्का लड़के वालों के घर भेजा गया। यही नहीं, यदि किसी की मौत भी हो जाए तो मुस्लिम ठाकुरों के यहां से ही पगड़ी की रस्म अदा करने गोढ़ी बछेड़ा लोग आते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी है। लोग आज भी इस प्रथा का पालन करते हैं।
-1947 में आजादी के बाद बंटवारे का दुखदाई दौर पूरे देश को झेलना पड़ा था, लेकिन भटनेर से कोई मुस्लिम परिवार देश छोड़कर पाकिस्तान नहीं गया।
-डॉक्युमेंटी में दिखाया गया है कि किस तरह यहां के लोगों ने साथ रहना पसंद किया और मुस्लिम परिवारों को आगे बढ़कर पाकिस्तान जाने से रोक लिया गया था। इसमें हालिया समय के बारे में जानकारी देने के लिए जेवर के विधायक ठाकुर धीरेंद्र सिह का साक्षात्कार भी है।

जैसलमेर किले के केयरटेकर से मिली अद्भुद जानकारी
-इन गांवों का संबंध जैसलमेर के शाही घराने से है। जब हमारी टीम वहां पहुंची तो केयरटेकर डॉक्टर रघवीर सिंह भाटी से मुलाकात हुई। उन्होंने भटनेर और मुस्लिम, ठाकुर के बारे में जानकारी दी। वहां से सोमनाथ हनुमानगढ़ी से एेतिहासिक जानकारी जुटाने के बाद 365 गांवों की एकता की अनूठी मिसाल का पता चल सका।

एक साल तक किया अध्ययन
-ऐतिहासिक दायरे को समझने के लिए डॉक्युमेंटी के जरिए एकता का अनूठा मेल पेश करने के लिए हुमायूंनामा, तुजुके बाबरी, जैसलमेर का इतिहास, राजपूतों का इतिहास के अलावा 15 एेतिहासिक किताबों का एक साल तक गहन अध्ययन के बाद ही गांवों की सत्यता का पता चल सका। इसके बाद यह डॉक्युमेंटी बनाई जा सकी।

शूटिंग के दौरान हुआ विरोध
-हिंदू मुस्लिम विवाद और बिसाहड़ा कांड के बाद इस तरह की डॉक्युमेंट्री बनाना चुनौती पूर्ण था। इसका गुर्जर और मुस्लिमों ने विरोध भी किया, लेकिन बाद में स्क्रीनिंग दिखाकर उनको भी फिल्म का मकसद बताया गया। इसके बाद उन्होंने शूटिंग के दौरान पूरी मदद भी की।
-शूटिंग के दौरान एक पल ऐसा भी आया, जब जैसलमेर में शूटिंग करने के लिए बीएसएफ और होम मिनिस्ट्री की अनुमति लेनी पड़ी। दरसअल, यहां ड्रोन का प्रयोग वर्जित है। ऐसे में काफी मशक्क्त के बाद शूटिंग के लिए ड्रोन की अनुमति मिली।

बिसाहड़ा कांड भ्रम था
-पराशर ने बताया, बिसाहड़ा कांड कोई सोची-समझी साजिश नहीं, बल्कि भ्रम था, उन्माद था। भीड़ को नहीं समझाया जा सकता, लेकिन इसका राजनीतिकरण हुआ वह गलत था। जहां प्यार है वहां टकरार है।
-उन्होंने कहा, इस मालमे में जो आरोप थे, अखलाक परिवार से उनकी बेहद करीबी थी। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि गांव से सिर्फ अखलाक परिवार ने ही पलायन किया। बाकी ढाई सौ परिवार आज भी उसी शांति‍ प्रेमभाव से वहां रह रहे हैं।
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