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गुदा रोग के लि‍ए आज भी कारगर है प्राचीन पद्धति‍ क्षारसूत्र, जानें कैसे होता है उपचार

7 वर्ष पहले
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प्रतीकात्‍मक फोटो।
बीमारि‍यों के प्रति‍ लोगों में जागरुकता फैलाने के लि‍ए हर साल नौ दि‍संबर को 'वर्ल्‍ड पेशेंट सेफ्टी डे' मनाया जाता है। इसका मकसद यह है कि‍ बेहतर जीवनशैली अपनाकर लोग स्‍वस्‍थ्‍ा रहें। इस अवसर पर dainikbhaskar.com आपको वि‍भि‍न्‍न बीमारि‍यों और उनसे बचने के उपायों के बारे में बताने जा रहा है। इसी कड़ी में हम जानकारी देने जा रहे हैं गुदा रोग और इसके उपचार के लि‍ए प्राचीन पद्धति‍ क्षारसूत्र के बारे में।
वाराणसी. बदलते लाइफ स्‍टाइल की वजह से इन दि‍नों लोगों में (खास कर बच्‍चों में) खतरनाक और असाध्‍य कहे जाने वाला गुदा रोग ‘भकंदर’ (फि‍स्‍तूला इन एनो) काफी तेजी से बढ़ रहा है। एलोपैथी दवा इस रोग में खास कारगर साबि‍त नहीं होती है, क्‍योंकि‍ दोबारा होने का भी खतरा रहता है। वहीं, ‘क्षारसूत्र’ एक ऐसी प्राचीन पद्धति‍ है जि‍सके इलाज के बाद भकंदर रोग दोबारा नहीं होता। इस पद्धति‍ द्वारा इलाज पर खर्च भी काफी कम आता है।
बीएचयू के राष्ट्रीय क्षारसूत्र चिकित्सा संसाधन केंद्र के शल्यतंत्र विभाग के हेड डॉ. मनोरंजन साहू ने बताया कि‍ क्षारसूत्र गुदा रोग के इलाज के लि‍ए एक बहुत ही चमत्कारिक और प्राचीन पद्धति‍ है। इसमें औषधीय गुणों से लैस पौधों के रसों, पत्तियों के दूध और उनके राख के पाउडर से धागे के जरि‍ए सौ फीसदी सफल इलाज किया जाता है।
आधुनि‍क मेडि‍कल साइंस के लि‍ए चुनौती भरा है यह रोग
उन्‍होंने बताया कि‍ भाग-दौड़ भरे जीवन और खान-पान की वजह से 50 फीसदी से अधि‍क लोग कब्ज के शिकार हो जाते हैं। बीएचयू में हुए एक रिसर्च के मुताबिक, करीब 24 फीसदी लोग भकंदर यानि‍, गुदा रोग से परेशान हैं। इस रोग से पीड़ित रोगियों में बच्चों की संख्या में तेजी से ग्रोथ हो रहा है। बीएचयू आयुर्वेद विभाग के क्षारसूत्र विभाग के आकड़ों के अनुसार, सात फीसदी से अधि‍क बच्चे इस रोग से पीड़ित हैं। डॉ. मनोरंजन साहू ने बताया कि आधुनिक मेडि‍कल साइंस के लिए ये रोग चुनौती भरा है।

क्‍यों और कैसे होता है यह भकंदर रोग
डॉ. साहू ने बताया कि‍ इस रोग में मरीज का क्रिटिकल कंडि‍शन हो जाता है। टॉयलेट में अधि‍क देर तक बैठने, ऑयली चीजें खाने और मांसाहारी खाना अधि‍क खाने से गुदा द्वार के पास फोड़ा हो जाता है, जो स्टूल पास करते समय फूट जाता है और नासूर बन जाता है। यहां सबसे पहले खून निकलता है और फि‍र धीरे-धीरे पस निकलने लगता है। उन्‍होंने बताया कि‍ आधुनिक चिकित्सा पद्धति में सर्जरी के बाद भी ये रोग दोबारा हो जाता है, क्‍योंकि‍ गुदा द्वार के अंदर तक की त्वचा इंजर्ड (जख्‍मी) हो जाती है। इसके बाद असहनीय पीड़ा के साथ खून का निकलना शुरू हो जाता है।
आगे पढ़ि‍ए कि‍स प्रकार होता है क्षारसूत्र पद्धति‍ से इस रोग का इलाज