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काशी के किसान ने मोदी के 'क्लीन इंडिया विजन' की तर्ज पर बनाया इको टॉयलेट

7 वर्ष पहले
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फोटो: काशी के किसान द्वारा बनाई गई इको टॉयलेट।
वाराणसी. काशी के एक किसान उदय प्रताप सिंह ने कमाल किया है। इन्होंने पीएम मोदी के 'क्लीन इंडिया विजन' से प्रभावित होकर खास तकनीक से इको टॉयलेट बनाया है। यह टॉयलेट पूरी तरह से इंसान के डायजेस्टिव सिस्टम पर आधारित है। इस तरह के टॉयलेट में गंदगी बाहर नहीं निकलती। साथ ही इसमें खतरनाक मीथेन गैस भी नहीं बनती। ऐसे टॉयलेट का इस्तेमाल ट्रेनों में भी किया जा सकता है। इससे पटरियां गंदी नहीं होंगी।
इस इको टॉयलेट को बनाने वाले उदय प्रताप सिंह बिहार के भभुआ जिले के रहने वाले हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म करने के बाद वह किसान बन गए। फिलहाल वह काशी में रहते हैं। उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट और मॉडल को बीएचयू आईआईटी एक्सपर्ट्स के सामने रखा है। उन्होंने इसकी तारीफ की है। आगे की कार्रवाई के लिए इस प्रोजेक्ट और मॉडल को जल्द ही दिल्ली भेजा जाएगा।
क्या है टॉयलेट की खासियत
1. उदय प्रताप सिंह बताते हैं कि पुरानी तकनीक के टॉयलेट टैंक में जहरीली मीथेन गैस बनती है। हवा के संपर्क में आकर यह कार्बन मोनो ऑक्साइड में बदल जाती है। ये गैस इंसानों और पेड़-पौधों के लिए खतरनाक होता है। वहीं, इको टॉयलेट में मीथेन गैस बाहर नहीं आती, बल्कि खास विधि की वजह से यह गैस बन ही नहीं पाती।
2. पुरानी तकनीक के टॉयलेट में निकलने वाले पानी और अवशेष में कीटाणु होते हैं। इको टॉयलेट में ऐसा नहीं होता। इसके अवशेष में नाइट्रोजन फास्फोरस पोटास (एनकेपी), जिंक, आयरन, मौलिब डीएम (रसायन) निकलता है। इसकी वजह से इसका इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकता है।
3. पुरानी तकनीक के टॉयलेट में अक्सर छह फीट लम्बा, गहरा और चौड़ा टैंक बनाया जाता है। इसकी दीवारें सीमेंट की बनाई जाती हैं। इसकी वजह से सीमेंटेड रसायन क्षार और अम्ल की रासायनिक प्रतिक्रिया देते हैं। लिहाजा दीवारों पर नमी आने लगती है। इससे घरों में भी सीलन आ जाती है। इसके उलट इको टॉयलेट के टैंक में सीमेंट का कहीं इस्तेमाल नहीं होता। इसकी दीवारें हाई क्वालिटी पॉलिस्टर रेजिन से बनाए जाते हैं। इसमें अम्लीय-क्षारीय प्रतिक्रिया नहीं होती। जिससे दीवारों और घरों में सीलन नहीं लगती।
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