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जानिए काशी विश्वनाथ मंदिर पर किसने किया था आक्रमण, फिर क्या हुआ?

अविमुक्त क्षेत्र यानि शिव के त्रिशूल पर बसी है काशी नगरी जहां कभी प्रलय नहीं आ सकती।

Dainik Bhaskar

Feb 20, 2014, 11:03 AM IST
historical background of kashi vishwanath
वाराणसी. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी-विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। शास्त्रों में मिलता है कि वर्तमान के विशेश्वर गंज में दिव्य ज्योति साक्षात बाबा विश्वनाथ के रूप में दिखाई पड़ती थी। इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
बाबा विश्वनाथ के इतिहास से जुड़ीं कई ऐसी बातें हैं, जिनकों शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे। डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि बादशाह अकबर के बाद टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1558 में करवाया था। 1669 में औरंगजेब ने आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया गया था।
विश्वनाथ मंदिर का प्राचीन इतिहास
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्या ने बताया कि अनादिकाल से बाबा काशी में विराज रहे हैं। धर्मग्रंथों में महाभारत काल से भी पहले का वर्णन मिलता है। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक (1325) के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब 'विविध कल्प तीर्थ' में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोज शाह तुगलक के समय कुछ मंदिर मस्जिद में तब्दील हुए थे। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही लिंग है।
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historical background of kashi vishwanath
औरंगजेब ने किया था विखंडित 
अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि 1669 में औरंगजेब ने मंदिर पर आक्रमण किया था, उस समय वहां के पुरोहितों ने लिंग को बचाने के लिए उसे ज्ञानवापी कूप में छिपा दिया था। तत्कालीन कविराज चंद्रभान कश्मीरी ने औरंगजेब को पत्र लिखकर बताया था कि 'ऐ राजा मंदिर का करिश्मा देख, गिरने के बाद भी इसमें ज्योति है'। औरंगजेब काशी का नाम बदलकर मोहम्दाबाद रखना चाहता था।
 
अहिल्याबाई होल्कर ने कराया जीर्णोद्धार 
 
इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1777 में काशी विश्वनाथ मंदिर का पूर्णतः जीर्णोद्धार कराया। यह मंदिर 30 वर्ग फीट में निर्मित हुआ। इसकी चोटी (शीर्ष ) 51 फीट है। इस मंदिर में पांच पंडप भी महारानी ने ही बनवाए थे। 1853 में पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने 22 टन सोने से मंदिर के शिखरों को स्वर्णमंडित करवाया था। 
 
 
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काशी है अविमुक्त क्षेत्र
 
अविमुक्त क्षेत्र यानि शिव के त्रिशूल पर बसी नगरी जहां कभी प्रलय नहीं आ सकती। काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रमुख अर्चक श्रीकांत मिश्रा ने बताया कि 68 शिव क्षेत्रों में महादेव प्रातःकाल और संध्या काल में ही विराजते हैं। काशी में महादेव का हमेशा ही वास रहता है , इसलिए इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। काशी खंड (13 वी सदी ) विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी के उत्तर में स्थित था। 
 
बाबा विश्वनाथ कि धार्मिक महत्ता 
 
अर्चक श्रीकांत मिश्रा ने बताया कि श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में हैं, दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं और दूसरी और भगवान शिव वाम रूप (सुंदर ) में विराजमान हैं, इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। देवी भगवती के दाहिने ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही प्रशस्त होता है। काशी में ही मनुष्य को मुक्ति मिलती हैं, और पुनः गर्भधारण नहीं होता, भगवान शिव खुद यहा तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना यहां शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता। 
 
सबसे महत्वपूर्ण बाबा विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है, जिसमें ऊपर की ओर गुम्बद श्री यंत्र से मंडित हैं, जो तांत्रिक सिद्धि के लिए सर्वोत्तम स्थान है। श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है। 
 
बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र के दृष्टि से चार प्रमुख द्वार है जो इस प्रकार हैं... 1- शांति द्वार 2- कला द्वार 3- प्रतिष्ठा द्वार 4- निवृत्ति द्वार।  
 
श्रीकांत मिश्रा ने बताया, इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान हैं। पूरी दुनिया में ऐसा नहीं मिलेगा जहा शिव-शक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार हो।
 
 
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