20 साल से शिवलिंग बना रही है नन्ही, मुंबई और जयपुर में है खास डिमांड / 20 साल से शिवलिंग बना रही है नन्ही, मुंबई और जयपुर में है खास डिमांड

नन्ही के मुताबिक, मूर्तियों को बनाने से पहले घर की सफाई की जाती है।

Amit Mukherjee

Nov 17, 2015, 08:00 AM IST
बेटी के साथ घर में शिवलिंग बनाती नन्ही। बेटी के साथ घर में शिवलिंग बनाती नन्ही।
चिंतकों की हत्या, दादरी की शर्मनाक घटना, बीफ और कालिख। इन्टॉलरेंस को लेकर अवॉर्ड वापसी पर हो-हल्ला...। कुछ लोग भले ही देश को सांप्रदायिकता के अंधेरे में धकेल रहे हों, लेकिन उम्मीद की रोशनी दिखाने वालों की भी कमी नहीं। यूपी में गंगा-जमुनी तहजीब की धारा बहाने वाले 'भागीरथ ' कदम-कदम पर मिलते हैं। dainikbhaskar.com आपको ऐसे ही कुछ लोगों से मिलवाने जा रहा है, जो अपने बेहतरीन काम से हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बढ़ाकर कह रहे हैं-हमसे सीखो...
वाराणसी. प्रह्लाद घाट की रहने वाली मुस्लिम महिला नन्ही देश के लिए सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बन गई हैं। वो पति अतहर की मौत के बाद पिछले 20 साल से पारे के जरिए भगवान शिव, नंदी, मां दुर्गा और गणेश समेत कई चीजें बनाती आ रही हैं। नन्ही ने बताया, ''भगवान की पारे की मूर्तियां हम आस्था और बड़ी शिद्दत से बनाते हैं। इन्हें बनाते समय साफ-सफाई का भी पूरा ख्याल रखा जाता है। समाज में प्यार और भाईचारे का रिश्ता देश की तरक्की का दर्पण है।''
नन्ही ने पति के गुजर जाने के बाद उसके हुनर को आगे बढ़ाया। मौजूदा वक्त में वो परिवार की हर जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं। उनकी तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। छोटी बेटी फरहा मां की मदद के साथ नौकरी भी करने लगी है। बेटा हैदर भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत अाजमा रहा है। उन्होंने बताया,''पारे को ठोस आकृति में ढालना आसान काम नहीं है। मेरे पति ने ये हुनर अपने कुछ जानने वालों से सीखा था। वो चाहते थे कि समाज में नफरत की दीवार को गिराकर प्यार की इमारत को खड़ा किया जाए। उनकी मौत के बाद परिवार को संभालना मुश्किल था। परिवार और समाज के बुजुर्गों ने मेरा काफी हौसला बढ़ाया। कुछ वक्त बाद मैंने भी पारे से शिवलिंग, भगवान गणेश और मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाना शुरू कर दिया। लोगों का प्यार मिलता गया और बेटियों को पढ़ाने के साथ-साथ उनकी शादियां भी कर दीं। मेरी बेटियों ने भी इस नेक काम में काफी मदद की।''
मुंबई-जयपुर में है खास डिमांड
नन्ही के मुताबिक, '' समाज के लोगों से जब प्यार मिलता है तो काम करने का मजा दोगुना हो जाता है। मूर्तियों को बनाने से पहले घर की सफाई की जाती है। इसके बाद फार्मा को साफ पानी से धोया जाता है। जिस कमरे में प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, वहां खाने-पीने की कोई भी चीज लेकर नहीं जाते हैं। सांचे से निकालने के बाद प्रतिमाओं की हाथों से नक्कासी की जाती है, जिसमें काफी मेहनत करनी पड़ती है। मुंबई और जयपुर में इन मूर्तियों की काफी डिमांड है।''
कभी नहीं लगा हिंदुओं से अलग हूं: फरहा
बेटी फरहा ने बताया,'' मैं नौकरी करने जाने से पहले मां की मूर्तियां बनाने में मदद करती हूं। दुनिया में कुछ लोग धर्मों को अलग नजरिये से देखते हैं। एक-दूसरे से नफरत करते हैं। हर इंसान जिंदगी को खूबसूरती से जीना चाहता है। पिछले 20 सालों में मुझे कभी नहीं लगा कि हिंदुओं से अलग हैं। भगवान की मूर्तियों को हम बड़े ही पवित्र तरीके से बनाते हैं। भावनाओं के समंदर में हर इंसान को गोते लगाना चाहिए , तभी खुशहाली हर दरवाजे पर दस्तक देगी।''
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पिछले 20 साल से बना रही हैं मूर्तियां। पिछले 20 साल से बना रही हैं मूर्तियां।
मूर्तियां बनाने में मां की मदद करती फरहा। मूर्तियां बनाने में मां की मदद करती फरहा।
शिवलिंग बनाने का सांचा, जिसमें मूर्तियों को ढाला जाता है। शिवलिंग बनाने का सांचा, जिसमें मूर्तियों को ढाला जाता है।
intolerance debate muslim woman making statues of hindu deities
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नन्ही बनाती हैं पारे से शिवलिंग। नन्ही बनाती हैं पारे से शिवलिंग।
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बेटी के साथ घर में शिवलिंग बनाती नन्ही।बेटी के साथ घर में शिवलिंग बनाती नन्ही।
पिछले 20 साल से बना रही हैं मूर्तियां।पिछले 20 साल से बना रही हैं मूर्तियां।
मूर्तियां बनाने में मां की मदद करती फरहा।मूर्तियां बनाने में मां की मदद करती फरहा।
शिवलिंग बनाने का सांचा, जिसमें मूर्तियों को ढाला जाता है।शिवलिंग बनाने का सांचा, जिसमें मूर्तियों को ढाला जाता है।
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नन्ही बनाती हैं पारे से शिवलिंग।नन्ही बनाती हैं पारे से शिवलिंग।
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