वाराणसी. आईआईटी बीएचयू और काशी कथा की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी रविवार को केएन उडुप्पा सभागार में शुरू हुआ। संगोष्ठी 'वाराणसी: कल, आज और कल' के उद्घाटन अवसर पर श्री मठ पंचगंगा के जगतगुरू रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने कहा कि काशी मोक्ष क्षेत्र है। अन्य स्थानों पर कई वस्तुएं बनती हैं, लेकिन काशी मुक्ति का उत्पादन करता है। ज्ञान भूमि काशी खुद क्योटो और सेंटियागो न बनकर, उनके लिए आदर्श बने।
स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा कि धार्मिकता, संस्कृति से काशी समृद्ध रहा है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि वर्तमान में सभी क्षेत्रों में गिरावट आई है। इसे बचाना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि काशी के मूल स्वरूप को संजोना होगा तभी काशी की मूल आत्मा जीवित रहेगी।
काशी को संजोने की है जरूरत
विशिष्ट अतिथि के रूप में अन्नपूर्णा मंदिर के महंत श्री रामेश्वरपुरी जी महाराज ने कहा कि अध्यात्म चेतना से ही विकास होगा। काशी को आत्म अनुसंधान का केंद्र बनाना होगा। बनारस के दिग्गज काशी व्यापार की नगरी नहीं, श्मशान की भूमि है। यहां अनादि काल से मोक्ष का उत्पादन ही काशी का वैशिष्ट्य है। आने वाले कल में वाराणसी के मूल स्वरूप को क्षत-विक्षत नहीं करना है, बल्कि इसे संजोकर रखना है।
बौद्ध धर्म के त्रिरत्न का हुआ था जन्म
कार्यक्रम में उपस्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संघ के संस्थापक अध्यक्ष केएस थेरो ने कहा कि बौद्ध धर्म के त्रिरत्न का जन्म काशी में हुआ है। 'काशीकथा' काशी के अतीत वर्तमान अनागत का संकलन है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू आईआईटी के निदेशक राजीव संगल ने कहा कि ज्ञान प्राप्त करना और जीवन जीने के बीच समन्वय होना आवश्यक है। ज्ञान, विवेक और विज्ञान को एक कड़ी में जोड़ना होगा। मानव की पूर्णता ज्ञान का तर्क के आधार पर लोक व्यापारीकरण द्वारा ही संभव है।
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