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किसके श्राप से टेढ़ा हुआ था यह मंदिर, भरा रहता है कीचड़, पढ़ें 5 MYTHS

पिछले शनिवार बिजली गिरने से टूटा था मंदिर का शिखर।

Dainik Bhaskar

Mar 14, 2016, 12:38 PM IST
टूटे रत्नेश्वर महादेव मंदिर को देखने उमड़े लोग। इनसेट में कीचड़ से भरे गर्भ गृह में पूजा करते भक्त। टूटे रत्नेश्वर महादेव मंदिर को देखने उमड़े लोग। इनसेट में कीचड़ से भरे गर्भ गृह में पूजा करते भक्त।
वाराणसी. पिछले शनिवार को देर रात बिजली गिरने से मणिकर्णिका घाट के पास बना रत्नेश्वर महादेव मंदिर चर्चा में आ गया है। आखिर किसके श्राप से यह मंदिर टेढ़ा है, अब इस पर बहस शुरू है। dainikbhaskar.com ने कुछ जानकारों से बात की तो मंदिर से जुड़ी पांच अलग कहानियां सामने आईं। मंदिर की AGE भी है कन्फ्यूजिंग...

- इस मंदिर का निर्माण कब हुआ था इसे लेकर भी अलग-अलग दावे हैं।
- रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक इसका कंस्ट्रक्शन 1825 से 1830 के बीच हुआ।
- वहीं रीजनल आर्कियोलॉजी ऑफिसर के मुताबिक यह 18वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था।
- घाट के आसपास बसे पुरोहितों का मानना है कि रत्नेश्वर महादेव की स्थापना 15वीं सदी में हुई थी।

1. अहिल्या बाई ने दिया था श्राप
- पुरोहित श्याम शंकर तिवारी के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण अहिल्या बाई की दासी ने करवाया था।
- अहिल्या बाई होलकर शहर में मंदिर और कुण्डों निर्माण करा रही थीं।
- उसी समय रानी की दासी रत्ना बाई ने भी मणिकर्णिका कुण्ड के समीप शिव मंदिर निर्माण कराने की इच्छा जताई।
- निर्माण के लिए उसने अहिल्या बाई से पैसे उधार लिए थे।
- अहिल्या बाई मंदिर देख प्रसन्न थीं, लेकिन उन्होंने रत्ना बाई से कहा था कि वह इस मंदिर को अपना नाम न दे।
- दासी ने उनकी बात नहीं मानी और मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव रखा।
- इस पर अहिल्या बाई नाराज़ हो गईं और श्राप दिया कि इस मंदिर में बहुत कम ही दर्शन-पूजन हो पाएगी।
- तभी मंदिर टेढ़ा हो गया और साल में ज्यादातर समय गंगा में डूबा रहता है।

2. संत के क्रोध ने किया टेढ़ा

- स्थानीय निवासी रमेश कुमार सेठ ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण किसी राजा ने करवाया था।
- 18वीं शताब्दी के आस पास कोई महान संत इस मंदिर पर साधना किया करते थे।
- संत ने राजा से मंदिर के रखरखाव और पूजन करने की जिम्मेदारी मांगी थी।
- राजा ने संत को मंदिर नहीं दिया, जिससे क्रोधित महात्मा ने श्राप दिया कि - जाओ यह मंदिर कभी पूजा करने लायक नहीं रहेगा, और मंदिर टेढ़ा हो गया।
3. पंडों को मिले श्राप से झुका मंदिर

- मंदिर की देखभाल करने वाले गोपाल मिश्रा ने भी अपना वर्जन बताया।
- गोपाल के मुताबिक यहां कभी एक महंत पूजापाठ करते थे।
- उन्हें यहाँ के पंडे तंग किया करते थे, जिससे वे क्रोधित होकर श्राप देकर चले गए।
- तब से आज तक इस मंदिर की पूजा बमुश्किल साल में केवल 4 महीने ही हो पाती है।
- बाकि 8 महीने मां गंगा ही अभिषेक करती हैं या बाढ़ की मिट्टी गर्भ गृह में पड़ी रहती है।

4. नहीं उतरा मां का कर्ज

- तीर्थ पुजारी राजकुमार पांडे ने बताया कि कथाओं के अनुसार 15 और 16वीं शताब्दी के बीच कई राजा-रानियां काशी वास के लिए आए।
- उनमें से एक थे मान सिंह।
- उनका सेवक (नाम का कहीं उल्लेख नहीं है) भी अपनी मां रत्नाबाई को लेकर काशी आया।
- वह अपनी मां के दूध का कर्ज उतारना चाहता था, जिसके लिए उसने शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
- निर्माण के लिए उसने देश के कई हिस्सों से शिल्पकारों को बुलावाया।
- बेटा दूध का कर्ज उतारना चाहता है इस बात से मां की भावनाओं को ठेस लगी।
- जब बेटे ने मां से कर्ज की बात कहते हुए मंदिर में दर्शन करने को कहा तो वह बाहर से ही प्रणाम कर चली गई।
- बेटे ने रोककर कहा, मां अंदर दर्शन नहीं करोगी क्या? इस पर मां ने कहा कि कैसे करूं यह मंदिर तो सही बना ही नहीं।
- बेटे ने जैसे ही पलट कर देखा, वैसे ही मंदिर एक तरफ धंस गया और टेढ़ा हो गया।

5. अमेठी राज परिवार ने करवाया कंस्ट्रक्शन
- जिला सांस्कृतिक समिति के सचिव डॉ रत्नेश वर्मा के मुताबिक अमेठी राज परिवार ने 1857 में मंदिर का ढांचा खड़ा किया था, तभी से मंदिर टेढ़ा है।
- इसे जयपुर के शिल्पकारों ने बनाया था।
- मंदिर का आकर दुर्गा मंदिर की तरह था, इसलिए शिखर गुम्बदों पर शेर बना है।
- विष्णु अवतार और कृष्ण लीलाएं बनी है।

इंग्लिश स्पेशलिस्ट कर चुके हैं रिसर्च
- इतिहासकार एसके सिंह के मुताबिक 18वीं शताब्दी के आसपास जेम्स प्रिंसेप ने अपने द्वारा बनाए बनारस के स्केच में रत्नेश्वर महादेव मंदिर को उकेरा था।
- बताया जाता है कि अंग्रेजों ने भी मंदिर के टेढ़ा होने के पीछे काफी रिसर्च की थी।
- कई दिनों तक अंग्रेज विशेषज्ञों की टीम ने दौरा भी किया था।
आगे की स्लाइड्स में देखिए मंदिर की कुछ और फोटोज...
गर्भ ग्रह जाने के रास्ते में भी अक्सर रहता है पानी। गर्भ ग्रह जाने के रास्ते में भी अक्सर रहता है पानी।
शनिवार को बिजली गिरने से मंदिर का शिखर दो तरफ से टूट गया था। शनिवार को बिजली गिरने से मंदिर का शिखर दो तरफ से टूट गया था।
शिखर से 50 किलो से अधिक वजन का पत्थर नीचे गिरा था। शिखर से 50 किलो से अधिक वजन का पत्थर नीचे गिरा था।
मंदिर की देखभाल और रखवाली करते हैं गोपाल। मंदिर की देखभाल और रखवाली करते हैं गोपाल।
पत्थर के साथ ही छोटे टुकड़े भी गिरे। पत्थर के साथ ही छोटे टुकड़े भी गिरे।
बिजली गिरने की घटना को पुरोहित व पंडितों ने अशुभ घटना करार दिया है। बिजली गिरने की घटना को पुरोहित व पंडितों ने अशुभ घटना करार दिया है।
बिजली गिरने की वजह से जिस तरह मंदिर का शिखर टूटा यह भी अजीबोगरीब है। शिखर ऊपर से टूटने की जगह नीचे से दो विपरीत दिशाओं में टूटा। बिजली गिरने की वजह से जिस तरह मंदिर का शिखर टूटा यह भी अजीबोगरीब है। शिखर ऊपर से टूटने की जगह नीचे से दो विपरीत दिशाओं में टूटा।
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टूटे रत्नेश्वर महादेव मंदिर को देखने उमड़े लोग। इनसेट में कीचड़ से भरे गर्भ गृह में पूजा करते भक्त।टूटे रत्नेश्वर महादेव मंदिर को देखने उमड़े लोग। इनसेट में कीचड़ से भरे गर्भ गृह में पूजा करते भक्त।
गर्भ ग्रह जाने के रास्ते में भी अक्सर रहता है पानी।गर्भ ग्रह जाने के रास्ते में भी अक्सर रहता है पानी।
शनिवार को बिजली गिरने से मंदिर का शिखर दो तरफ से टूट गया था।शनिवार को बिजली गिरने से मंदिर का शिखर दो तरफ से टूट गया था।
शिखर से 50 किलो से अधिक वजन का पत्थर नीचे गिरा था।शिखर से 50 किलो से अधिक वजन का पत्थर नीचे गिरा था।
मंदिर की देखभाल और रखवाली करते हैं गोपाल।मंदिर की देखभाल और रखवाली करते हैं गोपाल।
पत्थर के साथ ही छोटे टुकड़े भी गिरे।पत्थर के साथ ही छोटे टुकड़े भी गिरे।
बिजली गिरने की घटना को पुरोहित व पंडितों ने अशुभ घटना करार दिया है।बिजली गिरने की घटना को पुरोहित व पंडितों ने अशुभ घटना करार दिया है।
बिजली गिरने की वजह से जिस तरह मंदिर का शिखर टूटा यह भी अजीबोगरीब है। शिखर ऊपर से टूटने की जगह नीचे से दो विपरीत दिशाओं में टूटा।बिजली गिरने की वजह से जिस तरह मंदिर का शिखर टूटा यह भी अजीबोगरीब है। शिखर ऊपर से टूटने की जगह नीचे से दो विपरीत दिशाओं में टूटा।
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