फोटो: ग्रीन टेक्नोलॉजी मॉडल दिखाते रमेश मौर्या।
14 दिसंबर को नेशनल एनर्जी कंजरवेशन डे मनाया जा रहा है। इस अवसर पर dainikbhaskar.com अापको कुछ रोचक तथ्यों से रूबरू करा रहा है।
वाराणसी. बीएचयू आईआईटी के TOCIC (Teep out reach cum cluster innovation center) में उन इनोवेटरों को खास जगह दी जाती है, जिन्होंने विज्ञान की पढ़ाई नहीं की है। यहां नई तकनीक को जन्म देने वाले होनहारों की खोज की जाती है। इसी में से एक हैं दसवीं पास ऑटो
मोबाइल इलेक्ट्रीशियन रमेश मौर्या। इन्होंने ग्रीन टेक्नॉलॉजी से फ्यूल गैस बनाने की तकनीक इजाद की है।
उद्योगों को चलाने के लिए गैस आधारित बिजली प्लांट का छोटा मॉडल भी विकसित किया गया। भारत सरकार के DSIR (Department of Scientific and Industrial Research) के प्रमुख साइंटिस्ट ने भी इस खास तकनीक को परखा है। वे जल्द ही अपनी इस तकनीक को पेटेंट कराने वाले हैं।
रमेश मौर्या ने बताया कि सैकड़ों टन एग्रीकल्चर अवशेष खेतों में किसान जला देते है। सरसों की भूसी, धान की भूसी, फसल कटने के बाद अरहर के पौधे के निचले हिस्से को अक्सर जला दिया जाता है। इन अवशेषों को इकट्ठा कर उनकी ग्रीन टेक्नॉलॉजी से फ्यूल गैस आसानी से निकाला जा सकता है। इससे 70 फीसदी तक बिजली पैदा की जा सकता है।
गैस प्लांट से आसानी से बिजली इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि उनकी तकनीक में लोहे के चेंबर में जब अवशेष आएंगे तो एचटूओ और मिथेन के मिश्रण से फ्यूल गैस तैयार होगा। ऐसे में निकलने वाली गैस को कहीं भी इकट्ठा किया जा सकता है।
आगे पढ़िए ग्रीन टेक्नोलॉजी से फ्यूल गैस के फायदे...