तस्वीर में: पितृविसर्जन के दिन काशी के घाटों पर पितरों को जल देते , तर्पण करते और पिंडदान करते हुए लोग।
वाराणसी. काशी में पिंडदान करने का अपना अलग ही महत्व है। पुराणों में काशी में पिंडदान करना अनिवार्य बताया गया है। यहां पिंडदान करने से पितरों के मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति की बात कही गई है। काशी में पितरपख के इस पावन पर्व पर पूरे देश से लाखों श्रद्धालु आते है और यहां पिंडदान करने के बाद गया जाकर अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ विसर्जन करते हैं।
पितरपख का यह पर्व पूर्वजों की स्मृति में कृष्णपक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तिथि तक चलता है। अमावस्या के दिन पितृ विसर्जन का महत्त्व बहुत अधिक माना गया है। धर्म और संस्कृति की राजधानी काशी में गंगा घाटों से लेकर पिशाचमोचन कुंड तक पिछले 15 दिनों से अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करने के लिए लोगों का रेला लगा हुआ है। सभी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए काशी में आकर पिंड विसर्जन कर रहा है।
पश्चिम बंगाल से आए श्रीरंगनाथ स्वामी अपने पिता के लिए पिंडदान करने आए है और यहां से से बिहार के गया जाएंगे। उन्होंने बताया कि काशी आकर मन को बहुत शांति मिली है। पिताजी के लिए पिंडदान करने आया था। उन्होंने बताया कि पुराणों में जो बात कही गई वो सब सही है। मुझे पिंडदान करने के बाद बहुत शांति मिल रही है।
ज्योतिषाचार्य अनूप द्विवेदी ने बताया कि अमावस्या के दिन पितृ विसर्जन करने का अपना अलग महत्व है और इसकी धार्मिक मान्यता भी है। इस दिन पितृ विसर्जन करने से पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है और वो प्रसन्न होते हैं। जिससे विसर्जन करने वाले व्यक्ति के जीवन में सुख और समृद्धि आती है। काशी में पितृ विसर्जन का उल्लेख पुराणों में है।
आगे तस्वीरों में देखिए काशी में गंगा घाट किनारे पिंडदान करते लोग...