फोटो: बीएचयू स्थित गंगा रिसर्च सेंटर और (इनसेट में) गेट पर जड़ा ताला।
वाराणसी. पीएम
नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गंगा को साफ और स्वच्छ रखने के लिए 'नमामि गंगे प्रोजेक्ट' की शुरुआत की है। इसके तहत सरकार गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के कार्य में जुटी है। वहीं, यहां का 29 साल पुराना और देश का इकलौता गंगा रिसर्च सेंटर बदहाली के चलते बंद हो गया है। यहां के मेनगेट पर पिछले तीन साल से ताला लटका है। न तो यहां छात्र हैं और न ही उन्हें पढ़ाने के लिए कोई प्रोफेसर। पिछले 19 साल में इस रिसर्च सेंटर से महज 54 छात्रों ने एमटेक और दो छात्रों ने रिसर्च किया है। ऐसे में गंगा को साफ करने के उद्देश्य पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
गंगा रिसर्च सेंटर, आईआईटी बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर यूके चौधरी ने बताया कि साल 1986 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई थी। इसके प्रभाव से बीएचयू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में गंगा रिसर्च सेंटर की स्थापना हुई। यह देश का इकलौता सेंटर था। इसकी स्थापना का उदेश्य था कि यहां से पढ़ने के बाद छात्र गंगा की बेहतरी के लिए काम करेंगे। इसका फायदा पर्यावरण और कृषि में लगे लोगों को मिलेगा। हालांकि, बदहाली के चलते ऐसा नहीं हो पाया।
क्या कहते है प्रो. चौधरी
प्रोफेसर चौधरी इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सेंटर में पांच साल पहले यहां छात्रों की काफी संख्या थी। यहां से पढ़कर निकलने के बाद उन्हें अच्छी नौकरी भी मिलती थी। अभी हालात बिगड़ गए हैं। गंगा पर रिसर्च करने के लिए विशेषज्ञ लोग नहीं हैं। ऐसे में छात्रों को बेहतर ट्रेनिंग नहीं मिलती। इसके चलते इस संस्थान का कोई भविष्य नहीं दिख रहा है।
रिटायरमेंट के बाद भी पढ़ाने की थी इच्छा
प्रो. चौधरी ने बताया कि वह अपने रिटायरमेंट के बाद भी छात्रों को पढ़ाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने प्रशासन को चिट्ठी भी लिखी थी। अभी तक इसका जवाब नहीं मिला। बड़ी अजीब बात है कि रिवर मैनेजमेंट की पढ़ाई तक बंद कर दी गई है।
आगे पढ़िए, क्या कहते हैं सेंटर के वर्तमान इंचार्ज...