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जब बाबा विश्वनाथ मां भगवती का गौना करा लौटे काशी, ऐसे उड़े रंग-गुलाल

4 वर्ष पहले
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वाराणसी. फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरी एकादशी यानी रंगों का उत्सव मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार, होली के पहले बाबा विश्वनाथ मां भगवती का गौना कराकर वापस काशी चले आते हैं। इस दिन लोगों को बाबा के चल प्रतिमा का दर्शन होता है। हर भक्त के मन में बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेलने की इच्छा होती है। इसके लिए संकरी गलियों में जन सैलाब उमड़ पड़ता है। आगे पढ़‍िए 200 साल से अध‍िक से चल रहा ये परंपरा... 
 
 
-विश्वनाथ मंदिर के महंत ने बताया कि मान्यता के अनुसार, देवलोक के सारे देवी-देवता इस दिन स्वर्गलोक से बाबा के ऊपर गुलाल फेंकते हैं।
-मंदिर परिसर दर्जनों डमरुओं की गूंज से गुंजायमान हो जाता है। इस परंपरा को 200 साल से ऊपर हो चुका है।
-उन्होंने बताया कि बाबा विश्वनाथ का बसंत पंचमी को बाबा का तिलक, शिवरात्रि को शादी और रंगभरी एकादशी को गौना होता है।

होता है बाबा का गौना
-महाशिवरात्रि पर बाबा भोले का विवाह होता है। इस दिन काशी में पूरी रात जाग कर लोग बाबा का विवाह संपन्न कराते हैं।
-इसके बाद पड़ने वाली एकादशी को बाबा का गौना होता है। इस दिन वे अपने ससुराल जाकर मां पार्वति की विदाई कराकर विश्वनाथ मंदिर लाते हैं।

रंग-गुलाल से नहा उठती है काशी
-रंगभरी एकादशी के दिन रंग और गुलालों से काशी मानों नहा उठती है।
-संकरी गलियों में बाबा विश्वनाथ और मां पार्वती की प्रतिमा घुमाने के बाद पावन प्रतिमा को बाबा विश्वनाथ और मां पार्वती की प्रतिमा घुमाने के बाद उन्हें आसन पर बैठाया जाता है।
 
 
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