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'मेरे बेटे को फांसी मत देना, एक बार उसको मेरे सामने खड़ा कर दो'

8 वर्ष पहले
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वाराणसी. सर्वोच्च न्यायालय ने 15 लोगों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। इस ऐतिहासिक फैसले से इनके परिवारों में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी है। वाराणसी के रामजी और उनके बहनोई सुरेश का परिवार भी उन्ही लोगों में से एक है।
उम्मीद छोड़ चुके इस परिवार में लंबे संघर्ष के बाद फांसी माफ़ी की खबर किसी संजीवनी से कम नहीं है। नैनी जेल में सजा काट रहे इस परिवार के दो सदस्यों को अब राहत मिल गई है। अस्सी साल की रामजी की बूढ़ी मां बस दिन रात यही कहती थी कि उसके बेटे को फांसी के फंदे पर मत लटकाना, वह बेकसूर है।
क्या था पूरा मामला
दरअसल अक्टूबर 1996 में भेलूपुर थानाक्षेत्र के बजरडीहा चौकी निवासी सुरेश चौहान का भाई रमेश से संपत्ति विवाद चल रहा था। उसी दौरान सुरेश ने अपने साले रामजी के साथ मिलकर रमेश और उसकी पत्नी समेत तीन बच्चों की हत्या कर दी थी। पुलिस जांच में सुरेश और रामजी पकड़े गए थे।
1998 से मानवाधिकार जननिगरानी समिति ने इस मामले को उठाया था। कई बार राष्ट्रपति से सजा माफ़ी की गुहार भी लगाई गई। जननिगरानी समिति के सचिव डॉ लेलिन ने बताया कि 19 दिसंबर 1997 से सजा काट रहे सुरेश और रामजी को वाराणसी के सेशन कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। अब कई वर्षों की लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस परिवार को राहत दी है।
क्या कहती है बूढ़ी मां
इस अस्सी वर्षीय बूढ़ी मूला देवी का कहना है कि उनके बेटे को सामने खड़ा कर दो। वह अपने कलेजे के टुकड़े को जी भर के देखना चाहती हैं। उसे बिना देखें डेढ़ दशक से भी ज्यादा का वक़्त हो गया है।
आगे देखें कैसे सुरेश और रामजी के परिवार में खुशी की लहर दौड़ पड़ी है...