फोटो: शायदा की नाम मात्र की दुकान, जिसपर 13 लोगों का पेट पलता है।
यूनिसेफ डे: हर साल 11 दिसंबर को 'यूनिसेफ डे' मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की यूनिट यूनिसेफ भारत सहित दुनिया में जगह-जगह बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही है। वहीं, यूपी में आज भी कई परिवार ऐसे हैं जिनके बच्चे बेहतर जीवनशैली से वंचित हैं। वे आज भी पढ़ने-लिखने के लिए मोहताज हैं। dainikbhaskar.com आपको कुछ ऐसे ही परिवारों से रूबरू करा रहा है।
वाराणसी. जिनकी वजह से चलता है करोड़ों रुपए का व्यापार, उसे बनाने वाली महिलाओं के बच्चे भुखमरी का जीवन बिताने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र की इकाई यूनिसेफ भारत सहित दुनियां में जगह-जगह जागरुकता और बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही है। लेकिन काशी में बनारसी साड़ी बनाने वाली महिलाओं के बच्चे आज भी बेहतर जीवनशैली से वंचित हैं।
बनारसी साड़ी उद्योग काशी की रीढ़ है। बुनकरी का ताना-बाना, जिसमें काम करते-करते महिलाओं की उंगलिया जख्मी हो रही हैं। जख्मी उंगलियों के कारण इन महिलाओं का आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है। वैसे तो पूरे बनारस के बुनकरों की स्थिति खराब है। इनमें सबसे बदतर बजरडीहा के ज्यादातर बुनकरों की है। कभी खुशहाल और ऐश का जीवन जीने वाले ये बुनकर अब अपने बच्चों को बेहतर जीवनशैली के साथ खिलाने और पढ़ाने के लिए भी मोहताज हैं।
जानिए उन परिवारों की हालत, जो बदहाली का जीवन बिताने को हैं मजबूर...
बजरडीहा निवासी नजमा खातून ने अपना हाथ दिखाते हुए बताया कि साड़ी के धागों को नोचते-नोचते उंगलियां जख्मी हो गई हैं। इसकी वजह से उनका आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है। एक सौ रुपए प्रति साड़ी के दर से मजदूरी करने वाली नजमा खातून के छह बच्चे हुए, जिसमें तीन बीमारियों की भेट चढ़ गए। अब तीन बच्चे हैं और पति बीमार हैं। पैसों की कमी से उनकी दवा के भी नहीं हो पाती। नजमा के घर की कुल आय 2,500 महीना है।
दूसरा परिवार जुलेखा बानो का है। अपने मायके मदन पुरा में जुलेखा ने कभी सोचा भी नहीं था की पर्दे में रहने वाले इन लोगों को कभी बेपर्दा होकर खुद काम करना पड़ेगा। इसके बावजूद पैसे की तंगी के चलते वह अपनी एक ही बेटी सबा को पढ़ा नहीं पा रही है। बेटी पढ़ना भी चाहती है। पति जमील अहमद बीमारी से तंग है। ऐसे में जुलेखा ने बेटी को न पढ़ा कर पति की दवाई को प्राथमिकता दी, जो गरीबी की इंतहा बताती है।
आगे पढ़िए अन्य परिवारों की हालत...