फोटो: विंध्याचल मंदिर, मिर्जापुर।
मिर्जापुर/वाराणसी. शारदीय नवरात्र 25 सितंबर से शुरू हो रहा है। इसके साथ ही देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा शुरू हो जाएगी। नवरात्र पर मिर्जापुर के विंध्य पर्वत पर विराजमान आदि शक्ति मां विंध्यवासिनी की विशेष अर्चना की जाती है। आदि शक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं। विंध्याचल ही ऐसा स्थान है, जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है, लेकिन 51 शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी ही एकमात्र पूर्णपीठ है। ऐसे में दूर-दराज के श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
वैसे तो विंध्याचल में साल भर देवी मां के दर्शन होते हैं, लेकिन यहां नवरात्र का खास महत्व है। यहां शारदीय और बासंतिक नवरात्र में चौबीस घंटे मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र के दिनों में देवी मां का खास श्रृंगार भी किया जाता है। इन नौ दिनों में महानिशा पूजा का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी के दिन तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद यहां विंध्यवासिनी मां की पूजा शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं।
तीनों रूपों की होती है पूजा
इस मंदिर के प्रधान पुजारी शिवजी महाराज मां विंध्यवासिनी के बारे में विस्तार से बताते हैं। उनके मुताबिक, देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने माता के दरबार में तपस्या की थी। तीनों देवताओं ने असुरों पर जीत हासिल करने के साथ ही जगत के कल्याण का वरदान मांगा था। इसके बाद माता विंध्य पर्वत पर विराजमान हुईं। दुनिया में यह इकलौता स्थान हैं, जहां मां महाकाली, महालक्ष्मी और अष्टभुजा स्वरूप में विराजती हैं।
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