एक कमरा उसमें एक तखत और जमीन में गद्दा डालकर तीन बच्चें। दिनभर के खेलकुद, स्कूल, और लड़ाई के बाद सुकून की नींद मारने पहुंच जाते। मैं कहीं भी उठाकर फेंक दिया जाता था। ज्यादातर नीचें से ऊपर। यानि गद्दे से तखत पर। उस पर पापा और चश्मे वाला भाई। बीच में मैं । एक पैर पापा के पेट पर। दूसरी तरफ धूमूं तो भाई का कंधा। वो भाई जब चश्मा उतार कर कहता था आजाओ, लगता था, मानों किसी बात की चिंता नहीं, एक पैर पापा के पेट रखकर जो चैन की नींद आती थी, वो अब नहीं।
जब लगता था जोर से झापड़ तो कम से कम तीन उंगली तो छप ही जाती थी, जोर से चिल्लाते हुए दीदी बोलती थी पढ़ों बैठकर, कहीं नहीं जाना हैं। गुस्से से धरती तक गीली कर देता था, लेकिन क्या करु रस्सी से बंधा जो रहता था। खैर बात भी सही थी पढ़ना जरूरी था।,बगल के चौके से आवाज आती अरे बस करो, कितना मारोगी पढ़ लेगा बाद में। कभी कैरम तो कभी सांप सीढ़ी, लाइट जाने पर यही हमारा टाइम पास था। ज्यादातर वो भाई साथ रहता था जो सबसे ज्यादा पीटता था।
अगल-बगल के चिन्नी-पिन्नी भी मौज लेने आ जाते थे। वो भाई जो अब दिल्ली वासी वो गया है जब हौकता था न तब सही में दिन में तारें दिखतें थे। ये बात और है कि उसे जाहिर नहीं करता था, लेकिन हाथ बहुत कर्रा था। जिंदगी इसी तरह मौज में चल रही थी। रोज सुबह शिद्दतों के साथ उठकर स्कूल जाना। हालांकिे एक बहाना रोज रहता था मेरा कम भाई का ज्यादा, पापा आज पेट में दर्द है। वो हमारे भाई हैं जो अब दिल्ली में घर बसा चुके हैं।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और कारंवा आगे बढ़ता गया अब मै पोस्ट ग्रेजुएट हो गया हुं, फाइनली स्ट्रगल के बाद अब पत्रकार बन रहा हूं, फोन आतें हैं सब ठीक चल रहा है ना! मै भी बोल देता हुं हां सब ठीक चल रहा है। हमेशा की तरह भाई से पैसे मांगने का सिलसिला अभी भी जारी है और जारी रहेगा, वो इसलिए नहीं कि मेरे पास पैसे नहीं हैं ब्लकि इसलिए कि मै उनकी जिम्मेदारी हूं, भाई हैं बड़े और हक है मेरा। लखनऊ में दोस्ती यारी इतनी बढ़ा दी कि समय निकालना भी मुश्किल था। मौज इतनी कि कुछ सोचने के लिए समय नहीं।
वक्त आ गया था कुछ करने का, बहुत उठापटक हो चुकी है। लेकिन जो हो समय से
पैदा हुआ- समय से (लाजमी है यार)
पढ़ाई हुई- समय से
नाईट आउट हुआ - समय से
प्यार हुआ - समय से
दिल टूटा - समय से (ऑबयस है )
स्ट्रगल किया - समय से
जॉब कर रहा हूं - समय से
अब रात में रोज घर में दो बजे पहुंचता हूं, अरे शिफ्ट है मेरी - पहुंचते ही मां खाना गर्म करने लगती हैं। टीवी खोलकर एक - दो गाने सुनकर बेड पर पहुंच जाता हूं। अब नींद आती है तो पलकें उठा देता हूुं, याद आती है उन पलों की तो सोकर गवांना नहीं चाहता हूं। एक समय था घर का तापमान बहुत ज्यादा रहता था। सात लोग रहते थे। स्कूल से वापस लौटते ही सभी एक साथ खाना खाते थे। भाई के साथ कभी कहीं तो कभी कहीं सौर सपाटे के लिए निकल जाता था। दो रुपए के पांच बताशे खाकर वापस आ जाता था।
बेफ्रिकी की मौज थी और शायद उसी के रवानगी भी थी। आज जब अकेले सोता हू तो पापा का पेट, चश्में वाले भाई का कंधा और बात- बात पर लड़ना और मार खाना याद आता है। घर अब सूना लगता है, सात की जगह अब चार रहते हैं। रात में मम्मी से बात करता हूं, और करते - करते सो जाता हूुं- वो भी मुझे बात करता देख अपनी नींद उड़ा देती हैं। फिर सोचता हूु, जरूरी था क्या कि हम बड़े हो जाएं, छोटे ही रहते तो सही था।