फोटो: कैलाश सत्यार्थी अपनी टीम के सदस्यों के साथ।
झांसी. बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से 2014 के शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कैलाश के लिए यह सफर आसान नहीं था। मुसीबत के दिनों में उनके कई साथी हमेशा उनके साथ रहे। उन्हीं में से एक हैं रामशंकर चैरसिया। उन्होंने dainikbhaskar.com की टीम से कैलाश के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।
उन्होंने कहा कि तीन दशक से कैलाश सत्यार्थी के वे साथ हैं। वे उनके सबसे पुराने और भरोसेमंद साथियों में से एक हैं। देश के जाने-माने चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट रामशंकर चैरसिया 1990 के दशक में ही कैलाश सत्यार्थी के साथ जुड़ गए थे। जब कैलाश सत्यार्थी ने मिर्जापुर-भदोही से आंदोलन शुरू किया, तब वह साथ थे। 1993 में बच्चों से बंधुआ मजदूरी के खिलाफ झारखंड से दिल्ली तक पहली पैदल यात्रा में रामशंकर चौरसिया सत्यार्थी के साथ थे।
उन्होंने बताया कि कैलाश सत्यार्थी ने बचपन बचाओ को कैसे खड़ा किया, वह किस तरह से रणनीति बनाते हैं? टीम के सदस्यों को किस तरह से अपनी रणनीति समझाते हैं? 1990 से 'बचपन बचाओ आंदोलन' शुरू कर 80 हजार बच्चों के मसीहा बने कैलाश सत्यार्थी के सामने मुसीबतें आईं, लेकिन वह हिम्मत नहीं हारे। कॉरपोरेट में मजदूरी करने वाले हजारों बच्चों को छुड़ाना सीधे तौर पर देश के बड़े औद्यौगिक घरानों से दुश्मनी लेना था। एक तरह से यह सरकार के भी खिलाफ था।
चौरसिया बताते हैं कि भारत में बनने वाली कालीन विदेशों में जाती थी। इसका कारोबार 20 हजार करोड़ रुपयों का था। कालीन उद्योग में बड़ी संख्या में बच्चे कार्य करते थे। कालीन अमेरिका में भी एक्सपोर्ट होती थी।
सत्यार्थी अमेरिका पहुंच गए। कालीन बच्चों द्वारा बनाई जा रही है, यह कहकर अमेरिकियों को कालीन खरीदने से रोकना और समझाना मुश्किल भरे कामों में से था, लेकिन सत्यार्थी ने यह कर दिखाया। तब अमेरिका में उनके साथ रहे रामशंकर चौरसिया कहते हैं कि ऐसी कई वजहें हैं, जिनसे सत्यार्थी ने खुद को करिश्माई व्यक्ति साबित किया।
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