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यहां सड़कों पर घूमती है लाशें, जानिए अंतिम संस्कार से पहले कितनी होती है दुर्दशा

7 वर्ष पहले
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तस्‍वीर में: सहारनपुर में एक रि‍क्‍शे पर दो-दो लावारिस लाश को लेकर जाता युवक वि‍क्रम।
सहारनपुर. लावारि‍स लाश के बारे में तो सभी जानते हैं कि‍ इनका कोई वारि‍स नहीं होता, लेकि‍न इन लाशों की दुर्दशा क्‍या होती है शायद ही सभी जानते होंगे? घटनास्‍थल से लेकर अंति‍म संस्‍कार तक इनकी क्‍या हालत होती है, यह जानकर आपकी रोएं खड़े हो जाएंगे। जी हां, इन लाशों को कफन तक नसीब नहीं होता है। वहीं, रि‍क्‍शे या ठेले पर सब्‍जी या अन्‍य सामानों की तरह बोरे में ठूंसकर मोर्चरी तक पहुंचाया जाता है। यह नजारा तस्‍वीरों के जरि‍ए सहारनपुर में युवक द्वारा रि‍क्‍शे पर लदे लाशों को ले जाते हुए देखा जा सकता है।
बताते चलें कि‍ सहारनपुर में हर वर्ष वि‍भि‍न्‍न अपराधों और दुर्घटनाओं को मिलाकर लावारिस सहि‍त तकरीबन 700 से 800 के बीच शव जिला अस्पताल के मोर्चरी में पहुंचते हैं। इनमें से 20 फीसदी के आसपास लावारिस शव होते हैं। जिनकी पहचान हो जाती है उनके परि‍जन तो पोस्टमार्टम कराने के बाद अंतिम संस्कार का प्रबंध कर लेते हैं, लेकिन जिनका कोई वारि‍स नहीं होता, वे शव जबरदस्त दुर्दशा के शिकार होते हैं।
लावारि‍स लाश को कफन भी नसीब नहीं होता
प्रशासन की लापरवाही के चलते लावारिस लाशों के साथ किस कदर अन्याय होता है, यह किसी भी शव को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है। हालत यह है कि‍ ऐसी लाश को दो मीटर कफन भी नसीब नहीं होता। पुलि‍स इधर-उधर से फटी-पुरानी चादर या अन्‍य कपड़ों में शव को लपेटकर सील कर देती है। इसके बाद घटनास्थल से जिला अस्पताल की मोर्चरी में पहुंचा दी जाती है।
मोर्चरी में फ्रीजर खराब होने से सड़ने लगती है लाशें
नियम के मुताबिक, लावारिस शव को पहचान के लिए 72 घंटे मोर्चरी में रखा जाता है। बस यहीं से शव की दुर्दशा होनी शुरू हो जाती है। मोर्चरी में दो शव रखने के लिए एक फ्रीजर का प्रबंध है, जो अक्सर खराब पड़ा रहता है। लाश को सड़ने से बचाने के लिए पुलिस कभी-कभी बर्फ का प्रबंध कर देती है, लेकिन गरीब परिवार का प्रतीत होने वाले शव को बर्फ भी नसीब नहीं होती। ऐसे में शव में कीड़े चलने के साथ दुर्गंध उठने लगती है। गर्मी के दिनों में यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है।
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