भारत के पीएम
नरेंद्र मोदी देशहित में जीतते, लेकिन संगठन की अंदरुनी राजनीति में घिरते नजर आ रहे हैं। देश के अंदर और बाहर उनकी बढ़ती लोकप्रियता से विरोधी खेमे में हड़कंप मचा हुआ है। इसकी बानगी आगरा धर्मांतरण मसले में दिख चुकी है। बीजेपी से जुड़े धड़ों के कार्यकर्ताओं के कृत्यों से भारत में तनाव का माहौल बना है। माना जा रहा है कि साफ-सुथरी छवि बनाने के मोदी के प्रयासों को भी गहरा धक्का लगा है।
गुजरात के सीएम से बीजेपी का पीएम प्रत्याशी घोषित होने तक वे पार्टी की अंदरुनी मनमुटाव से जूझते रहे। हालांकि बाद में उनके नाम पर सर्वसम्मति की मुहर लगी। केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने में उनकी छवि अहम बताई गई थी।
अब इसे किस्मत की जादूगरी कहें या मोदी के पर्सनालिटी की बाजीगरी, पीएम बनने के बाद से लगातार पेट्रोल और डीजल के दाम कम हुए हैं। उन्होंने कालाबाजारी रोकने के जो कदम उठाए उससे आम लोगों को राहत मिली। महंगाई पर लगाम लगने जैसा दिखने लगा है।
उन्होंने अपने केंद्रीय मंत्रियों को जिस तरह गाइड किया, उसकी सराहना हुई। अमेरिका जाकर उन्होंने जो लोकप्रियता हासिल की वह अपने आपमें मायने रखती है। सार्क सम्मेलन के दौरान चीन और पाकिस्तान को शिकस्त-सा माहौल झेलना पड़ा। जम्मू कश्मीर में चुनाव के दौरान उनके प्रचार के बाद बीजेपी के अच्छे प्रदर्शन की संभावनाएं जताई जा रही हैं। शनिवार को सोपोर में उनकी रैली के दौरान उमड़ा जनसैलाब इस बात की तस्दीक कर रहा था। उनके काम का तरीका हर वर्ग के लोगों को भाने लगा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि उनके तथाकथित अपनों को ही उनकी उपलब्धि से समस्या हो रही है। इसीलिए उनकी सहमति के बिना ही धर्मांतरण जैसे कृत्य रचे गए। इसे उनकी छवि बिगाड़ने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही विरोधी खेमे की चाल बताई जा रही है।
इस मामले में मोदी की चुप्पी दरअसल उनकी मूक सहमति नहीं, बल्कि विवशता मानी जा रही है। कुल मिलाकर उन्हें गैरों से कम लेकिन अपनों से ही अधिक खतरा दिखने लगा है।
नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो।