तस्वीर में: मंदिर में स्थित मां काली की मूर्ति।
झांसी. झांसी में स्थित महाकाली भवतारणी मंदिर देश के खास मंदिरों में से एक है। अमूमन मां काली रौद्र रूप में दिखती हैं, लेकिन इस मंदिर में देवी के सौम्य रूप का दर्शन होता है। यहां देवी सिर्फ बनारस साड़ी ही पहनती हैं। साथ ही इनका अलग-अलग तरह से 16 श्रृंगार किया जाता है। इसमें गुजराती, मराठी और बंगाली परंपरा के खास श्रृंगार शामिल हैं। यहां बाल पुजारी ही देवी का पूजा और श्रृंगार करते हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां पुजारी के सपने में आकर मां अपने श्रृंगार के रूप का आभास कराती हैं, उसके बाद ही उनका श्रृंगार किया जाता है।
मां काली का यह मंदिर झांसी के खटकयाना में मौजूद है। इसे मां भवतारिणी महाकाली के रूप में जाना जाता है। इसे लगभग 12 साल पहले स्थापित किया गया था। बाल्य रूप में मौजूद मां काली के साथ उनकी सखियां भी रहती हैं। उनके चरणों में बाल्य रूप में शिव जी रहते हैं। यहां के पुजारी की उम्र सिर्फ 23 साल है, जो 12 वर्षों से सेवारत हैं। यहां देवी की सेवा बच्चे ही करते हैं। हमेशा से काली माता के मंदिर में बली देने की प्रथा रही है, लेकिन यहां नीबू तक नहीं काटा जाता। बताया जाता है कि झांसी के अलावा मां काली का ऐसा मंदिर सिर्फ कोलकाता और दिल्ली में ही है।
हर दिन अलग तरह से हाता है श्रृंगार
मंदिर के पुजारी भैया महाराज बताते हैं कि मां काली को हर दिन अलग तरह का श्रृंगार किया जाता है। इसमें मराठी, गुजराती और बंगाली पद्धति से श्रृंगार किया जाता है। उन्हें पायल और बिछिया भी पहनाया जाता है। इस मंदिर में खाल की जगह देवी को सिर्फ बनारसी साड़ी पहनाया जाता है। इसके अलावा उन्हें किसी दूसरे तरह की साड़ी नहीं पहनाई जाती है। देवी के साथ इस मंदिर में उल्लू विराजमान है।
नहीं दी जाती है बलि
मान्यता है कि कई बार मां काली तब तक खुश नहीं होती, जब तक उन्हें बलि न चढ़ाया जाए। लेकिन, यहां मां काली के बाल्य रूप को बलि प्रथा पसंद नहीं है। यहां कभी भी बकरे की बली तो दूर नींबू भी नहीं काटा गया।
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