तस्वीर में: मां शाकंभरी देवी (बीच में)।
सहारनपुर. जिला मुख्यालय से उत्तर दिशा में लगभग 45 किलोमीटर दूर शिवालिक पहाड़ियों में स्थित सिद्धपीठ श्री शाकंभरी देवी मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां माता के सामने शीश झुकाने वाले भक्त सर्वसुख संपन्न हो जाते हैं। भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। साथ ही भक्तों में कुविचारों की समाप्ति के साथ सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
सिद्धपीठ श्री शाकंभरी देवी का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती, पदम पुराण और कनक धारा स्रोत आदि में मिलता है। मां भगवती का नाम शाकंभरी देवी के रूप में प्रचलित होने के बारे में मान्यता है कि प्राचीनकाल में दुर्ग नामक दैत्य ने ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान में चारों वेद मांग लिए। दैत्यों के हाथ चारों वेद लगने से सभी वैदिक क्रियाएं लुप्त हो गईं। परिणाम स्वरूप 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। इस कारण तीनों लोकों में अकाल पड़ गया।
त्राहि-त्राहि मचने पर देवताओं ने शिवालिक पर्वत की प्रथम शिखा पर मां जगदंबा की घोर तपस्या की। देवताओं की करूण पुकार सुनकर करूणामयी मां भगवती से रहा नहीं गया और वह देवताओं के समक्ष प्रकट हो गईं। व्याकुल देवताओं ने उनसे तीनों लोकों का अकाल मिटाने की प्रार्थना की।
माता की अश्रुवृष्टि से सूखी धरती हो गई तृप्त
इस पर मां भगवती ने अपने शत नेत्रों से नौ दिन और नौ रात तक अश्रुवृष्टि की। इससे सूखी धरती तृप्त हो गई। सभी सागर और नदियां जल से भर गई। उसी समय से नवरात्र की पूजा का प्रावधान बना और मां जगदंबा को शताक्षी कहा जाने लगा। वहीं, मां भगवती ने देवताओं की भूख मिटाने के लिए अपनी शक्ति से पहाड़ियों पर शाक और फल उत्पन्न किए। इसके बाद माता शाकंभरी नाम पड़ गया।
आगे पढ़िए दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में मिलता है मां शाकंभरी देवी का उल्लेख…