झांसी. सीमा चाहती तो पर्दे के पीछे छिपकर डकैतों के जाने का इंतजार कर खुद को बचा सकती थी, लेकिन मां को आंखों के सामने पिटते नहीं देखा गया। उसने हिम्मत जुटाई और डकैतों का सामना करते हुए तीन मंजिला इमारत से छलांग लगा दी। छलांग लगाने से उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और जमीन पर घिसटते हुए पुलिस थाने तक पहुंची। अब यूपी सरकार इन्हें यश भारती अवार्ड से सम्मानित करने जा रही है।
रीढ़ की हड्डी और अपने दोनों पैर गंवाने वाली सीमा इस घटना के बाद 12 सालों तक बिस्तर पर ही पड़ी रही। चार साल तक कोमा में रहने के बाद उसे हर कोई बेकार समझने लगा था। इसके बाद सीमा ने अपने इस संघर्ष से सबक लेते हुए एक एनजीओ शुरू किया। शिक्षा और हुनर बांटने के शौक ने सीमा को एक नई उड़ान दी। अब वह गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाती है। साथ ही हजारों महिलाओं को कुटीर उद्योग संस्था के माध्यम से रोजगार भी दे रखा है।
झांसी के खाती बाबा में रहने वाली रेलवे से रिटायर्ड पिता की बेटी वीरांगना सीमा तिवारी को अब यूपी सरकार सर्वोच्च वीरता पुरस्कार यश भारती से सम्मानित कर रही है। इससे पहले भी झांसी की इस वीरांगना को राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार दिए जा चुके हैं। 40 वर्षीय सीमा कहती हैं कि वह हमेशा से उड़ान बनना चाहती थी, सपना था कि आईएएस बनूं।
एक घटना ने बदल दी जिंदगी
झांसी से पहले सीमा तिवारी ग्वालियर में कैलाश सिटी सेंटर में रहती थी। वह पॉलिटेक्निक साइंस से एमफिल कर रही थीं। इसी बीच उनकी शादी तय हो गई। घर में शादी की तैयारियां चल रही थी। अप्रैल-मई में उसकी शादी थी। इसके बाद 18 फरवरी 1996 की रात सीमा के लिए बेहद काली साबित हुई। आधी रात के बाद घर पर डकैतों ने धावा बोल दिया। बावरिया गिरोह के डकैत दरवाजा तोड़कर उसके घर में घुस आए। बदमाशों ने आसपास के घरों के टेलीफोन काट दिए। डकैत सीमा के माता-पिता और अन्य परिजनों को बुरी तरह से पीटने लगे। पर्दे के पीछे छिपी सीमा से यह नहीं देखा गया। वह डकैतों के सामने आ गईं और जेवर आदि उनकी ओर फेंकते हुए सीमा ने पुलिस को बुलाने की धमकी दी। डकैतों ने उसे रोकना चाहा, लेकिन पुलिस तक पहुंचने की नियत से सीमा छत से छलांग लगा दी। छलांग लगाते ही सीमा के दोनों पैर और रीढ़ की हड्डी टूट गई। यहां से वह जमीन पर घिसते हुए पुलिस चौकी तक पहुंची।
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