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आठ साल में मालवा के 4800 किसानों ने खुदकुशी की

7 वर्ष पहले
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बठिंडा. मालवा में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला फिर से शुरू हो गया है। कैंसर की बीमारी के इलाज और कुदरत की पड़ रही मार से बर्बाद होती फसलों ने कर्जदार किसानांे को इस कदर झकझोर दिया है कि वे जिंदगी को मौत से बदतर समझने लगे हैं। कर्ज अदायगी के लिए सुखदूखोरों का दबाव किसानों को इस कदर तोड़ चुका है कि तीन दिन में बठिंडा और मानसा में दो किसानों ने सुसाइड कर लिया।

भास्कर की टीम ने जब इन पीड़ित परिवारों के घर जाकर हाल जाना तो खुलासा हुआ कि कैंसर की बीमारी और कुदरती आपदाओं से किसान कर्ज तले दब रहे हैं। यही कर्ज बाद में उनकी खुदकुशी का कारण बन रहा है। अफसोस किसानों के लिए बनने वाली सरकारी नीितयां भी कभी डिस्कशन से आगे नहीं बढ़ सकी।
बठिंडा और संगरूर में सबसे ज्यादा 2900 आत्महत्याएं
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने 2011 में सर्वे करवाया था। इसके मुताबिक, 2000 से 2008 तक 8 साल में बठिंडा और संगरूर जिले में 2900 किसानों और खेत मजदूरों ने कर्ज से तंग आकर आत्महत्याएं की। मालवा के अन्य जिलों को मिलाकर सरकार ने 4800 किसानों की आत्महत्याओं के केसों की पहचान की थी।
कैंसर के इलाज में जमीन बिकी, कर्ज चढ़ा, मिली मौत
वीरवार को फंदा लगाकर आत्महत्या करने वाले गांव घुम्मन कलां के किसान नाथ सिंह के कर्ज में डूबने की शुरुआत 1991 में हुई थी। तब उसकी पत्नी शांति कौर को कैंसर हुआ था। इलाज में कर्ज तो चढ़ा ही पांच एकड़ जमीन में से एक एकड़ जमीन भी बिक गई। मगर पत्नी नहीं बची। बीमारी में उलझा नाथ सिंह फसल पर ध्यान नहीं दे पाया और कर्ज बढ़ता गया। कर्ज चुकाने के लिए जब लोग परेशान करने लगे तो पीछा छुड़ाने के लिए नाथ सिंह ने गांव में ही जमींदारों से परनोट भरकर एक लाख रुपए कर्ज उठाया। फिर भी कर्ज नहीं उतरा तो 70 हजार रुपए को-ऑपरेटिव सोसायटी से और फिर जमीन पर कर्ज लिया। इसके बाद भी नाथ सिंह कर्ज नहीं उतार सका। फिर तीन लाख रुपए फिर बैंक से कर्ज लिया, जिसे वह चुका नहीं पाया। वहीं पांच साल पहले बेटी की शादी के लिए बची हुई चार कनाल जमीन भी बिक गई। किसान नाथ सिंह के बेटे घर चलाने के लिए ड्राइवरी करने लगे, घर तो चल गया, लेकिन कर्जदार जब चक्कर लगाने लगे तो तंग आकर नाथ सिंह ने आत्महत्या कर ली।
गांव घुमन कलां में मृतक नत्था सिंह के घरवालों को दिलासा देते लोग।