समकालीन कविता आंदोलनों में सीमित रहने वाली नहीं है ...
विज्ञानऔरतकनीक हमें जानकारी दे सकती है पर देखा जाए तो ज्ञान सिर्फ साहित्य और भाषा के पास ही है। साहित्य आपको सपने दिखाता है,समाज को समझने की समझ देता है। इसलिए इसका मूल्य हमेशा अन्य विषयों से ज्यादा ही रहेगा। कुछ इन्हीं शब्दों में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने पंजाब यूनिवर्सिटी में हुए समकालीन कविता पर एक दिवसीय सम्मेलन की शुरूआत की। हिंदी विभाग द्वारा आयोजित यह सेमिनार यूनिवर्सिटी के ईवनिंग डिपार्टमेंट हॉल में आयोजित हुआ। सेमिनार कौशिक ने कहा कि “हमारा समाज जितना संकीर्ण होता जा रहा है, उसी अनुपात में हमारा साहित्य भी। हमें कोशिश करनी होगी की कविताओं के संसार में जहां लिखने वालों की संख्या बढ़ाई जाए, वहीं उनकी कविताओं में लेखनी भी अच्छी हो। इसके बाद सेमिनार की अध्यक्षता कर रहे हुकुमचंद राजपाल बोले “क्या कविता को किसी एक आंदोलन, नारा, विचारधारा तक ही शामिल किया जाए? जो चीजें हमारे लिए हमारी संवेदनाओं से जुड़ी हैं उन्हें हम किसी एक आंदोलन में कैसे देख सकते हैं |कविता आन्दोलनों में सीमित रहने वाली नहीं है पहले कविता ऐसा नहीं थी मैं ये नहीं नहीं कहता पर इस समय की कविता अपने जीवन और समय से पूरी तरह जुड़ी है। इसके बाद मुख्य अतिथि प्रो. एके भंडारी ने कहा “हिंदी कविता और किसी भी भाषा की कविता समाज की बात करती है। अब हिंदी के कविताओं को फेसबुक और यूट्यूब पर भी देखा और पढ़ा जा सकता है। इन आलोचकों में डॉ. राजेंद्र गौतम, डॉ. रूप नारायण पटेल, ज्ञान प्रकाश विवेक, राजेंद्र सिंह टोकी, डॉ. रामगोपाल, डॉ. राकेश, प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह ‘जोश’, प्रो. फूलचंद मानव, प्रो. सुखदेव सिंह मिन्हास, प्रो. पंकज मालवीय, डॉ. कश्मीरी लाल, प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘साहिल’, डॉ बलवेंद्र सिंह, प्रो. नीरजा सूद, डॉ. गुरमीत सिंह और डॉ. प्रतिभा शामिल हुए। इसकेअलावा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की सहायक प्रो. डॉ. साएमा बानो ने भी गजल की बारीकियों पर विचार रखे।
सेमिनार में भाग लेते प्रतिभागी और अपने विचार रखते विषय विशेषज्ञ।