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सिटी रिपोर्टर } ‘आपकेशहर में गाड़ियों के कितने शोरूम हैं?

5 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर } ‘आपकेशहर में गाड़ियों के कितने शोरूम हैं? शायद आपको नहीं पता होगा। मैं बताता हूं कम से कम भी 100 से ज्यादा होंगे। अब आप ये बताइए कि आपके शहर में किताबों की कितनी दुकानें हैं? शायद गिनती भर। यही बताने हम इस सफर पर निकले हैं। यह सफर 15 दिसंबर 2015 को शुरू हुआ था, जो 7500 किलोमीटर का फासला तय कर 15 राज्यों तक पहुंचा। हमारा मकसद 90 दिनों में 20 राज्यों और 10 हजार किलोमीटर फासला तय करना है। सफर के 61वें दिन हम आज चंडीगढ़ में हैं।’ अक्षय राउतराय (35 वर्ष) और शताब्दी मिश्रा(32 वर्ष) कुछ इन्हीं शब्दों में अपने सफर को बयां किया। दोनों भुवनेश्वर से हैं और आजकल अपने प्रोग्राम रीड मोर इंडिया को लेकर 20 राज्यों की यात्रा पर हैं। दरअसल ये दोनों विभिन्न राज्यों में जाकर लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अक्षय बताते हैं,‘मैं बुक स्टोर के बिजनेस में पिछले छह सालों से हूं। मेरा जब भी देश के किसी शहर में जाना होता तो मैं किताबों की दुकानें ढूंढता, जो मुझे नाममात्र ही मिलतीं। ...आैर जो होतीं वह बंद होने की कगार पर होतीं। दो साल पहले मैं शताब्दी से मिला और हमनें भुवनेश्वर में अपनी एक किताब की दुकान खोली। उसे हमनें रीड मोर इंडिया नाम दिया। फिर धीरे-धीरे हमें महसूस हुआ कि सिर्फ कुछ लोग ही किताबें खरीदते हैं। ऐसे में हमने तय किया कि हम लोगों की पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ाएंगे। फिर क्या था, हमने 4000 किताबों को एक गाड़ी में भरा आैर निकल पड़े 20 राज्यों की यात्रा पर।’ अक्षय ने आगे बताया कि उनकी इस ड्राइव की शुरुआत उड़ीसा से हुई थी। वे हर रोज 300 किलोमीटर ड्राइव करते हैं आैर अब तक 1000 किताबें बेच चुके हैं। खास बात तो यह है कि ड्राइविंग सिर्फ शताब्दी ही करती है क्योंकि अक्षय गाड़ी चलाना नहीं जानते।

लिट्रेचर फेस्टिवल्स सीमित ग्रुप के लिए ही रह गए हैं...

इससे पहले भी कर चुके हैं 10 हजार किलोमीटर का सफर

शताब्दीने बताया कि वे दोनों इससे पहले भी 10 हजार किलोमीटर की यात्रा तय कर चुके हैं। वे उड़ीसा के सभी गांव और डिस्ट्रिक्ट को कवर कर चुके हैं। कहती हैं, ‘हम कुछ ऐसे इलाकों में भी पहुंचे थे, जहां गाड़ी का जाना मुमकिन नहीं था आैर हम किताबों से भरी गाड़ी ले गए थे। वहां हमें लोगों से बहुत प्यार मिला।’

आजकल हर राज्य में लिट्रेचर फेस्टिवल्स आम है, क्या वे किताबों को प्रोमोट नहीं कर रहे? इस पर शताब्दी बोलीं, ‘लिट्रेचर फेस्टिवल तो मात्र एक फैशन बनकर रह गया है। क्या आपने कभी किसी लिट्रेचर फेस्टिवल में आम इंसान को देखा है। दरअसल लिट्रेचर फेस्टिवल को सेलिब्रिटी स्टेट्स दे दिया गया है। आम इंसान जिस पर साहित्य लिखा जाता है वही लिट्रेचर फेस्टिवल से गायब रहता है। जबकि हम एक शहर में अलग-अलग जगहों पर जाकर कुछ वक्त बिताते हैं। लोगों को नए लिट्रेचर से वाकिफ करवाते हैं।

भुवनेश्वर के अक्षय और शताब्दी 61 दिनों से रीड मोर इंडिया 2015 ड्राइव पर निकले हुए हैं, शनिवार को वे शहर पहुंचे तो उनसे हुई बातचीत

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गाड़ियों के शोरूम रोज खुलते हैं पर किताबों के नहीं...

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