सिटी रिपोर्टर } एकदौर था जब कैंसर की बीमारी को
सिटी रिपोर्टर } एकदौर था जब कैंसर की बीमारी को लाइलाज बताया जाता था। उस दौर में शहर की रेणु सहगल ने सिर्फ कैंसर से जंग लड़ी बल्कि एक ऐसी सोसायटी भी बनाई जिसने लोगों को कैंसर पर जागरूक करना शुरू किया। यह बात 1997 की है। सहायता चैरिटेबल वेलफेयर नाम की यह सोसायटी अब भी लोगों को कैंसर के प्रति जागरूक करती है। ...आैर हर साल ‘कैंसर सर्वाइवर डे’ भी सेलिब्रेट करती है। सेलिब्रेशन इस साल भी हुआ, लेकिन थोड़ा हटके। वो इसलिए क्योंकि पहली बार किसी कैंसर सर्वाइवर की जिंदगी को मंच पर जिया गया। दरअसल, गवर्नमेंट होमसाइंस कॉलेज में इस सोसायटी ने ‘गॉड्स डॉटर’ नाटक का मंचन किया, जिसकी कहानी सोसायटी से जुड़ी एक सर्वाइवर की जिंदगी से ली गई। एक ऐसी सर्वाइवर जिसे तीन बार कैंसर हुआ आैर तीनों बार उसने हिम्मत नहीं हारी। दिव्यजोत कौर नाम की यह महिला सिर्फ कैंसर से लड़ी बल्कि अब जिंदादिली के साथ जी भी रही है। दिव्य जोत आैर इस सोसायटी की दूसरी मेंबर्स से हमारी बातचीत उनकी जिंदगी पर।
दिव्यजोत ने बताया, ‘मैं 17 साल की थी कि जब पता चला कि मुझे लिम्फोमा(ब्लड कैंसर)है। जब इस बात का सबको पता चला तो सभी हमदर्दी जताने लगे। जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने फैसला किया कि ऐसी दयनीय जिंदगी नहीं जीऊंगी। उस समय में बारहवीं में थी, मैंने पढ़ाई पर ध्यान दिया आैर कीमोथैरेपी लेती रही। मेरे बाल भी झड़ने लगे थे, खैर जैसे-तैसे मैं कैंसर के खतरे से बाहर गई। 23 साल की उम्र में मुझे फिर से कैंसर हो गया। उस समय मैं लुधियाना में एमबीए कर रही थी आैर हॉस्टल में रहती थी। ऐसे में मुझे ही खुद की देखभाल करनी थी। हॉस्टल के सैकेंड फ्लोर पर रोज चढ़ना-उतरना मुश्किल जरूर लगता था, लेकिन मैं फिर भी चढ़ती थी। क्योंकि मुझे दूसरी बार कैंसर हुआ था इसलिए ज्यादा डर नहीं लगा। मैं फिर ठीक हो गई। जॉब करते हुए मुझे मेरे जीवनसाथी मिले, जिन्होंने मेरी बीमारी को जानने के बावजूद भी मुझसे शादी की। अब सब कुछ ठीक चल रहा था। साल 2006 में मुझे तीसरी बार कैंसर ने जकड़ लिया। उस समय मेरा बेटा दस साल का था। मैं हैरान भी थी, आैर चुप भी। आखिर मेरे साथ ही बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है यह सोचकर परेशान भी। खैर, अब मैं तीसरी बार कैंसर से जंग लड़ने जा रही थी। फिर से वही कुछ शुरू हुआ आैर 8 साल बाद 2014 में मुझे डॉक्टर ने कैंसर से मुक्त बताया। इस वक्त मैं मैक्स स्किल्ज फ़र्स्ट में असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट के पद पर नियुक्त हूं। अपने परिवार और प्रोफेशन दोनों को अच्छे से संभाल रही हूं। मैं बस यही कहना चाहती हूं कि हिम्मत से सब कुछ मुमकिन है, जो मैंने बताया वह कहानी नहीं मेरी जिंदगी है।
}नाटक गॉड्स डॉटर के एक दृश्य में रेणु सहगल, िदव्यजोत कौर, नीना सिंह, सोनिया विर्दी आैर दमन मांगट।
खुद लिखा आैर खुद िनभाया
कार्यक्रम में पीजीआई कैंसर वॉर्ड के 15 कैंसर पीड़ित बच्चों ने भी हिस्सा लिया। इस मौके पर बच्चों ने विभिन्न परफॉर्मेंसेज दीं, जिन्हें स्टैंडिंग ओवेशन मिला।
इस नाटक को 15 दिन में तैयार किया गया था। इसकी कहानी को खुद दिव्यजोत ने लिखा है। इस नाटक में दिव्यजोत के साथ सोसायटी की ही पांच सदस्यों ने एक्ट किया आैर निर्देशन रंगकर्मी डॉ. पी.चंद्रशेखर का रहा। 20 मिनट के इस नाटक में हिम्मत से सब कुछ मुमकिन है का मैसेज दिया गया।
yes u can
सहायता चैरिटेबल वेलफेयर सोसायटी 1997 में बनी थी। तब से लेकर अब तक यह सोसायटी हर साल कैंसर सर्वाइवर डे मनाती है। इसके तहत कल्चरल आैर मोटिवेशनल प्रोग्राम्स होते हैं, लेकिन शनिवार को पहली बार किसी कैंसर सर्वाइवर की असल जिंदगी पर नाटक का मंचन हुआ।
कहानी नहीं मेरी जिंदगी है
मजबूत बनकर लड़ें, जीत होगी...
1989में मुझे कैंसर हुआ। मेरी फैमिली ने मुझे बहुत सपोर्ट किया। महज ढाई साल में मैंने कैंसर को मात दे दी। हालांकि दवाईयां अभी भी लेती हूं, ताकि मुझे यह दोबारा से हो। बस मैं यही कहूंगी कि खुद को मजबूत बनाकर लड़े, जीत जरूर होगी। -सोनियाविर्दी
10 दिन में हराया ब्रेस्ट कैंसर को...
मुझे90 के दशक में ब्रेस्ट कैंसर हुआ। तब मैं झांसी में आर्मी स्कूल की प्रिंसिपल थी आैर इलाज के लिए दिल्ली जाना था। मैंने हौसला नहीं छोड़ा आैर 10 दिन के भीतर ही मुझे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। मैं भी चाहती थी कि लोग ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक हों। -नीना सिंह
आर्मी की तरह ट्रेंड थी, इसलिए लड़ती रही
मैंसाल 1994 में 41 वर्ष की उम्र में कैंसर ग्रस्त हुई। पति मर्चेंट नेवी में थे इसलिए खुद ही अपना ख्याल रखना पड़ता था। लेकिन मैं शुक्रगुजार हूं अपने पिता का जो आर्मी में थे, उन्होंने मुझे आर्मी की तरह ही लड़ना सिखाया। आठ साल हो गए मुझे कैंसर मुक्त हुए। ...आैर कोई भी इससे मुक्त हो सकता है। -दमन मांगट
कैंसर पीड़ितों की बनाई सहायता सोसायटी
49साल की उम्र में जब मुझे कैंसर हुआ, तब इसे बहुत बड़ी बीमारी माना जाता था। फिर भी डेढ साल लगातार ईलाज के बाद मैं ठीक हो गई। मुझे लगा लोगों को कैंसर के प्रति अवेयर होना चाहिए। इसलिए मैंने आैर मेरी छोटी बहन नीलू तुली ने साल 1997 में इस सोसायटी का निर्माण किया। -रेणु सहगल, रिटायर्डचीफ आर्किटेक्ट, चंडीगढ़