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सिटी रिपोर्टर } एकपत्थर को जब तराशा जाता है तो

5 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर } एकपत्थर को जब तराशा जाता है तो वह मूर्त का रूप ले लेता है। बाद में यह ही कला प्रेमियों को बोलता हुआ महसूस होता है। पत्थर को तराशना हर किसी के बस में नहीं होता। उसके पीछे एक जर्नी होती है जिसमें कई तरह की मुसीबतें होती हैं और विभिन्न तरह के अनुभव। एक पत्थर स्कल्प्चर का रूप लेने के लिए किन पड़ावों से गुजरता है इसी कला का लाइव उदाहरण सेक्टर 10 के गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में देखने को मिला। यहां चंडीगढ़ ललित कला अकादमी का स्कल्प्चर सिंपोजियम चल रहा है। इसके तहत शुक्रवार को यहां तीन दिवसीय स्लाइड शो प्रेजेंटेशन की शुरुआत हुई। पहले दिन उदयपुर के आर्टिस्ट भूपेश कावड़िया और चेन्नई के आर्टिस्ट डी राजशेखरन ने प्रस्तुति दी। उन्होंने स्लाइड शो के जरिए अपना सफर आर्ट प्रेमियों को दिखाया। साथ ही यह भी बताया कि उन्हें इस दौरान किस तरह की मुसीबतों से गुजरना पड़ा।

‘मानों पत्थरों से बात करता हूं’

आर्टिस्टभूपेश कावड़िया का शो उनकी अब तक की लर्निंग पर रहा। उन्होंने “एक्सरसाइजेज इन माय जर्नी’ से प्रजेंटेशन देते हुए अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, सही कहूं तो मैंने पत्थर के साथ बातें करते हुए स्कल्प्चर बनाएं हैं। पलभर के लिए भी नहीं लगा कि काम कर रहा हूं। मैंने अपनी स्लाइड में स्टोन स्कल्पचर्स को दिखाया है। इनमें सभी एब्सट्रेक्ट सीरिज के उदाहरण है। स्कल्प्चर्स बनाते वक्त बहुत कुछ जाना है। जैसे कोई रंग ब्रश से अपनी कला को दर्शाता है वैसे हम पत्थरों से कला क्रिएट करते हैं। स्कल्पचर बनाना एक क्रिएटिव प्रोसेस है। इसमें हम किसी चीज को कॉपी नहीं करते बल्कि अपनी इमेजिनेशन को आर्ट बनाते हुए जाहिर करते हैं। मुझे आज तक पत्थरों को तराशते हुए कोई दिक्कत पेश नहीं आई। बल्कि मैंने मजा लेते हुए पत्थर पर डिजाइन शेप्स को उकेरा है।

आर्टिस्ट डी राजशेखरन का शाे इनवर्ड जर्नी पर रहा। उन्होंने 1977 से 2016 के सफर काे दिखाया। उनकी प्रेजेंटेशन कंटेम्परेरी चीजों पर आधारित रही। उन्होंने बताया कि पहले स्टोन कार्विंग के लिए कोई मशीनरी नहीं थी। छैनी, हथौड़ी से पत्थर को शेप देते थे। वे 1993 में जापान जाकर अपने लिए मशीनरी लेकर आए। उस समय मशीन इस्तेमाल करने के लिए बॉडी और माइंड की जरूरत होती थी। वो तय करता था कि मशीन किस हद-तक काम करेगी। पर अब टेक्नोलॉजी इतनी बेहतरीन हो गई है कि दिमाग का काम बिल्कुल खत्म हो गया है। अब मशीन और बॉडी ही तय करती है कि पत्थर को क्या रूप देना है।

art presentation

गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में चल रहे स्कल्प्चर सिंपोजियम में कलाकारों ने बताई बारीिकयांं

यूं तय होता है पत्थरों को तराशने का सफर

अब दिमाग नहीं, मशीन की जरूरत

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