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मक्की पर रिसर्च करेगी यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज

5 वर्ष पहले
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पंजाबमेंमक्का और बेबी कोर्न की फसल में सुधार और उत्पादन बढ़ाने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज का डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट साइंसिज अगले तीन साल तक पंजाब में रिसर्च करेगा। भारती फाउंडेशन इस रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट देगी और रिजल्ट पंजाब और देशभर के किसानों के साथ निशुल्क बांटे जाएंगे।

इस रिसर्च प्रोजेक्ट को यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट साइंसिज और कैम्ब्रिज सेंटर फॉर क्रॉप साइंस (3सीएस), पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी ऑफ फील्डफ्रैश फूड्स द्वारा संयुक्त तौर पर संचालित किया जाएगा। रिसर्च के दौरान नई किस्मों का खेतों में परीक्षण फील्डफ्रैश के एग्री सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (एसीई), लाडोवाल, लुधियाना, पंजाब में किया जाएगा।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के वाइस चांसलर प्रो. सर लेसजेक बॉरीसिविक्ज ने बताया कि इस रिसर्च प्रोजेक्ट से ना सिर्फ विश्व की बढ़ती आबादी को फूड सिक्याेरिटी प्रदान करने में मदद मिलेगी बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सफलता मिलेगी। रिसर्च के दौरान अनुवांशिक बदलावों, पर्यावरण कारकों और मक्का के फसल प्रबंधन के बीच संबंधों की जांच की जाएगी ताकि उत्पादन प्रक्रिया को अधिक बेहतर बनाया जा सके, जिससे उत्पादन लागत खर्च को कम करने और ग्रीन हाउस गैसों के निकास में कमी लाने में मदद मिलेगी।

इस नई रिसर्च पर राकेश भारती मित्तल, वाइस चेयरमैन, भारती इंटरप्राइजिज एवं काे-फाउंडर भारती फाउंडेशन ने कहा कि कार्यक्रम से ना सिर्फ उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण सफलता मिलेगी बल्कि देश में सक्षम कृषि के लक्ष्यों को प्रोत्साहित करने में भी मदद मिलेगी।

रिसर्च से प्राप्त परिणामों को राज्य कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालयों और ऐसी संस्थाओं के साथ सांझा किया जाएगा। इसके साथ ही भारती फाउंडेशन इफको किसान संचार लिमिटेड (आईकेएसएल), इंडियन फार्मर्स फर्टीलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) की सहभागिता में परिणामों को पूरे देश के किसानों के बीच विभिन्न डिजिटल टूल्स के माध्यम से वितरित किया जाएगा।

वैश्विक औसत से भारत में आधा है उत्पादन

मक्का,भारत में चावल और गेहूं के बाद तीसरी सबसे महत्वपूर्ण अनाज की फसल है जो कि देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 9 प्रतिशत का योगदान देती है। भारत में मक्का का प्रति हेक्टेयर फसल उत्पादन 2.5 टन है जो कि वैश्विक औसत 5.5 टन प्रति हेक्टेयर के आधे से भी कम है।

(स्त्रोत:इंडस्ट्री रिपोट्र्स/केपीएमजी, एनसीडीईएक्स)

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